Friday, April 12, 2024
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गुरू गोबिंद सिंह की जयंती

नेहा राठौर (20 जनवरी)

आज का दिन यानी 20 जनवरी को गुरू गोबिंद सिंह जी की 354वीं जयंती रुप में मनाया जाएगा। गुरू गोबिंग सिंह जी सिखों के नौवे गुरू यानी गुरू तेगबहादुर सिंह जी के पुत्र थे और सिखों के दसवें यानी आखिरी मानव गुरू थे। गुरू जी का जन्म जनवरी 1666 ई. में बिहार के पटना में माता गुजरी के घर हुआ था, जहां आज श्री पटना हरमिंदर साहिब गुरूद्वारा स्थापित है। वह एक आध्यात्मिक गुरू, योद्धा और एक अच्छे दर्शनिक थे। गुरू गोबिंद सिंह जी का नाम उनके माता पिता ने गोबिंद राय रखा था। जब गुरू जी 10 साल के थे तब ही मुगल शासक औरंगज़ेब ने उनके पिता की हत्या करवा दी थी, जिसके बाद वैशाखी के दिन उन्हें गुरू चुना गया। अपने पिता की मृत्यु के बाद गुरू जी ने मुग़लों के खिलाफ लड़ने का फैसला लिया और खालसा फौज का निर्माण किया।

गुरुग्रंथ साहिब की वाणी

उन्होंने तीन शादी की थी। उनके चार बेटे थे जिसमें से दो युद्ध में मारे गए और दो को औरंगज़ेब ने दीवार में चुनवा दिया था इसलिए उन्होंने गुरू ग्रंथ साहिब को गुरू बनाया, जिसमें मात्र सिख गुरूओं के उपदेशों के अलावा अन्य 30 सन्तो और अलंग धर्म के मुस्लिम भक्तों और जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी भी शामिल है। इसमें कबीर, रविदास, नामदेव, सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी और शेख फरीद के श्लोक भी शामिल किए गए है।

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खालसा फौज का निर्माण

इस फौज में फौजियों को भरती करने के लिए उन्होंने अपने पिता द्वारा अपनाए गए तरीके का इस्तेमाल किया। वो तरीका यह था कि एक बार 1675 में कश्मीरी पंडित उनके पिता के पास औरंगज़ेब द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने की वजह से मदद मांगने आए थे, तो उन्होंने कहा की जाओ जाकर कह दो औरंगज़ेब से की अगर गुरू तेगबहादुर का धर्म परिवर्तन करवा पाए तो हम सब भी करवा लेंगे लेकिन अगर नहीं करवा पाए तो किसी का धर्म परिवर्तन नहीं होगा। यह बात जानकर औरंगज़ेब ने उन्हें महल बुलाया जहां उन्हें कई लालच दिये गए पर गुरू तेगबहादुर नहीं माने तो उसने गुस्से में चांदनी चौक में एक पेड़ के पास उनकी हत्या कर दी, जहां शीशगंज गुरुद्वारा बनाया गया।

इसी तरीके से खालसा फौज में फौजीयों की भरती हुई। गुरू गोबिंद सिंह जी ने अपने लोगों को इक्टठा किया और कहा की मुझे एक स्वयंसेवक चाहिए जो अपनी जान दे सके। गुरू जी ने पूरे में चक्कर लगाया और बाद में एक व्यक्ति आगे आया और बाला में बनुंगा स्वयंसेवक। गुरू जी उस अंदर लेकर गए और जब बाहर आए तो उनके हाथ में खुन से सनी तलवार थी। ऐसे करके पांच लोग उनके साथ अंदर गए जो बाद में बाहर आए। उनको बाहर बुलाकर गुरू जी ने कहा की यही है खालसा फौज के पहले पांच फ़ौजी मेरे पंजप्यारे। गुरू जी ने उनके लिए नियम भी बनाए जिन्हें हम केश, कड़ा, कृपाण, कंघा और कच्छा बिना इन पांच चीजों के कोई भी इंसान खालसा नहीं माना जाएगा।

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गुरू जी की मृत्यु

गुरू जी ने अपने जीवन में कई युद्ध किए और जीते भी। आखिर में 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसका बेटा बहादुर शाह शासक बना, जिसने गुरू गोबिंद सिंह को अपनी सेना के साथ भारत के दक्कन क्षेक्ष में एक व्यक्ति के साथ सुलाह के लिए बुलाया, लेकिन बहादुर शाह ने इस बारे में कोई चर्चा नहीं की। गुरू जी ने सरहंद के नवाब वजीर खान जिनसे गुरू जी ने युद्ध किया था उन्होंने गुरू जी के पिछे जमशेद खान और वासिल बेग को गुप्त रूप से भेजा। उन्होंने गुरु जी का पिछा किया और उनकी नांदेड में हत्या कर दी। उन्होंने मरने से पहले गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु बनाया।

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