Monday, May 27, 2024
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आजाद हिंद फौज के संस्थापक सदस्य रास बिहारी बोस

नेहा राठौर (21 जनवरी)

आज का दिन यानी 21 जनवरी यह वही दिन है, जिस दिन भारत माता का एक पुत्र रास बिहारी बोस, जिन्होंने भारत के साथ साथ विदेश में भी भारत की आजादी को लेकर भारतीयों लोगों को जागरूक किया और उनमें आजादी की एक अलख जलाई, उनकी मृत्यु हुई थी। बोस का जन्म 25 मई 1886 बंगाल के बंगाली कायस्थ परिवार में हुए था। हालांकि उनके जन्म के स्थान को लेकर कुछ विवाद है।

रास बिहारी बोस की दो मां थी एक जननी और दूसरी पालक मां। उनके पिता का नाम बिनोद बिहारी बोस और मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था और उन्हें तिनकोरी दासी मां ने पाला था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा उनके दादा कालीचरण बोस की देख रेख में पाथसाला (आज का सुबलदाह राशबिहारी बोस एफपी स्कूल) में पूरी की। रास बिहारी बोस ने सुबालदाहा में अपने बच्चपन में लाठी खेल की शिक्षा ली।

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उनमें क्रांतिकारी आंदोलन की प्रेरणा अपनी जन्मभूमि सुबालदाहा में कहानियां सुनने मिली। वह स्वभाव से बहुत जिद्दी थे। गांव में सब उन्हें प्यार से रासू बुलाते थे। बोस ने डुप्लेक्स कॉलेज में पढाई पूरी की थी। उनके कॉलेज के प्रिंसिपल चारु चंद्र रॉय ने ही उन्हे क्रांतिकारी राजनीति में प्रेरित किया था। इसके बाद वे कोलकाता में मॉर्टन में शामिल हो गए। बोस को फ्रांस से चिकित्सा विज्ञान और जर्मनी से इंजीनिजरिंग में डिग्री भी प्राप्त की।

बंगाल में गदर क्रांति

वह शुरू से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में रुचि रखते थे, इसलिए 1908 में अलीपुर बम केस में मुक्दमें से बचने के लिए बंगाल छोड़ कर देहरादून चले गए जहां उन्होंने एक साल तक वन अनुसंधान संस्थान में क्लर्क का काम किया। वही वह गुप्त रूप से बंगाल क्रांतिकारियों के साथ जुड़ गए। जब प्रथम विश्व युद्ध हुआ तो वह बंगाल में मचे गदर क्रांति में प्रमुख शख्सियत के रूप में उभरे। इस गदर के दौरान वे अंग्रेज गुप्तचरों से बचने के लिए वे 1915 में रवींद्रनाथ टैगोर के रिश्तेदार प्रियनाथ टैगोर के उपनाम का इस्तेमाल करके जापान भाग गए। वहां पैन-एशियाई समूहों ने आश्रय दिया। इसके बाद उन्होंने कई बार अपना ठिकाना बदला क्योंकि अंग्रेज जापान पर उन्हें वापस करने के लिए दबाब बना रहे थे।

आजाद हिंद फौज की स्थापना

वहीं पर उन्होंने तोशिको बोस से शादी की और पत्रकार और लेखक के रूप में जापानी नागरिक बन गए। यह व्यक्ति थे जिन्हें जापान में भारतीय शैली की करी को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है। यह ब्रिटिश शैली की करी (सब्जी) से ज्यादा महंगी और काफी लोकप्रिय हो गई, इसीलिए उन्हें ‘नाकामुराया’ के बोस के नाम से भी जाना जाने लगा। एएम नायर के साथ बोस ने जापानी अधिकारियों को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करने के लिए राजी करने में सहायता की। इसके बाद बोस में 28-30 मार्च को एक सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की। वहीं उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता के लिए एक सेना बनाने का प्रस्ताव रखा। जब 22 जून 1942 में बैंकॉक में लीग का दूसरा सम्मेलन आयोजित किया गया तो बोस ने सुभाष चंद्र बोस को लीग में शामिल होने के लिए कहा और इस सेना के अध्यक्ष के रूप में उन्हें कमान सोंपी। इस सेना का नाम भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA), जिसे ‘आजाद हिंद की फौज’ भी कहते है । इस सेना में मालया और बर्मा में जापानियों द्वारा पकड़े गए भारतीय कैदियों को शामिल किया गया। इस फौज के लिए उन्होंने एक झंड़ा भी चुना। जापान सरकार ने उन्हें उनके कार्यों के लिए राईजिंग का क्रम देकर सम्मानित किया। इसके बाद टी.बी की बिमारी के कारण उनकी मृत्यु 1945 में आज के दिन ही हो गई थी।

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