Monday, April 15, 2024
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सामाजिक बुराइयों में से एक है दहेज प्रथा

पवन कुमार 

हम सभी जानते हैं दहेज लेना या देना गैर कानूनी अर्थात् कानूनन अपराध है, फिर भी आज तक दहेज प्रथा का अंत क्यों नहीं हुआ।? क्यों लगातार समाज में दहेज प्रथा का प्रचलन बढ़ता जा रहा है,क्यों? लगातार दहेज को लेकर महिलाओं की हत्या होती है, महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित कर महिलाओं को आत्महत्या के लिए मजबूर किया जाता है, क्यों?कन्या भ्रूण हत्याएं की जाती है।दहेज प्रथा एक अभिशाप है सामाजिक कलंक है, क्यों लेते हैं दहेज क्यों देते हैं दहेज? हम सभी जानते हैं कि दहेज लेना या देना कानूनी अपराध है फिर भी खुलेआम लिया एवं दिया जाता है दहेज क्यों? क्या दहेज तभी दहेज माना जाता है जब कोई लड़की दहेज के लिए जला दी जाती है अथवा शारीरिक मानसिक एवं आर्थिक यातनाओं के चलते जब कोई लड़की आत्महत्या कर लेती है। कोई घटना घटित होने के बाद ही क्यों होती है कार्यवाही। स्थिति यह बन जा रही है कि लगतार दहेज के लालची लोगों द्वारा घटनाओं की खबर सुन आहत मां-बाप करते हैं कन्या भ्रूण हत्या?

हमारा देश भारत वर्ष ,आर्यव्रत, हिंदुस्तान, इंडिया, चार नामों से जाना जाता है। हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता का विश्व भर में लोहा माना जाता है, जहां बेटियों, कन्याओं की पूजा देवी के रूप में होती है फिर क्यों जलाई जाती है बेटियां? क्यों शोषित है बेटियां? किसी समय शिक्षा का अभाव था तो माना जा सकता था कि लोगों में ज्ञान का अभाव था,लेकिन आज सबसे ज्यादा दहेज की घटनाएं शिक्षित समाज में हो रही है। लेखक का मानना है कि इसके लिए केवल लड़का पक्ष ही जिम्मेदार नहीं है सबसे ज्यादा जिम्मेदार है लड़की पक्ष, अक्सर देखने को मिलता है कि लड़की पक्ष जब लड़की के रिश्ते की बात करने जाते हैं तो ऐसे बात करते हैं जैसे लड़का खरीदने या लड़की बेचने आए हो लड़के पक्ष से मांग पूछी जाती है कहा जाता है हम अपनी हैसियत से ज्यादा ही करेंगे क्यों भूल जाते हैं लालच का बीज तो आप ही बो रहे हैं। हमारे देश में अनगिनत सामाजिक संगठन है जो सामाजिक उत्थान की बात करते हैं लेकिन अगर तह तक जाए तो सच्चाई कुछ और ही मिलेगी।हमारे देश में दहेज प्रथा से निपटने के लिए बहुत से कानून है।
दहेज निषेध अधिनियम 1961 के अनुसार दहेज लेन देन या लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद या ₹15000 का जुर्माने का प्रावधान है। दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए जो कि पति और उनके रिश्तेदारों द्वारा कीमती वस्तुओं की अवैधानिक मांग के मामले में आजीवन की कैद और जुर्माना हो सकता है। धारा 406 के अंतर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों को 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है। यदि यह लड़की का स्त्री धन को सौंपने को मना करते हैं तो धारा 304 के अनुसार कम से कम 7 साल कैद एवं आजीवन कारावास।लड़की की है असामान्य परिस्थिति में मृत्यु होने पर दहेज का मुकदमा बनता है।हम सब जानते हैं कि दहेज प्रथा के कारण लड़की का शोषण होता है लेकिन इसका एक पहलू और भी है,अक्षर लड़कियां पीहर पक्ष या अन्य किसी के बहकावे में आकर अपने घर संसार में खुद ही आग लगा लेती है।

छोटी छोटी बातों को बड़ा रूप दे देना,छोटी छोटी बातों पर सास, ससुर,नंद,देवर,देवरानी जेष्ठ,जेठानी,यहां तक कि पति के साथ भी रूखा व्यवहार (झगड़ा)करती है।ओर बात जब हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो दर्ज होता है दहेज का मुकदमा ।इस दहेज ने कितने ही घर बर्बाद कर दिए,कितने निर्दोष लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है।कितनी लड़कियां दहेज प्रथा की शिकार हुई हैं।कोन है जिम्मेदार?
लेखक का मानना है कि दहेज स्वेच्छा से हो या मांगने पर दहेज ,दहेज होता है।इसको जड़ से खत्म करो।

पत्ते तोड़ने से किसी वृक्ष का का अंत नहीं होता वृक्ष को खत्म करने के उसकी जड़ को उखाड़ना पड़ता है।ओर आज दहेज प्रथा ने सामाजिक बुराइयों में वट वृक्ष का रूप ले लिया है अगर इसको खत्म करना है तो इसकी जड़ों को उखाड़ना होगा। दहेज स्वेच्छा से हो या मजबूरन इसको रोकना होगा तभी हम दहेज प्रथा के शिकार परिवारों को बचा सकते हैं।बहुत गणमान्य नागरिक ऐसे हैं जो लोग दहेज लेना या दजेज देना पाप (गुनाह)मानते हैं लेकिन हम उनको समाज में क्या स्थान देते हैं यह विचारणीय है।लेखक का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नही।

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