अरुणा शानबाग को श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों का तांता

मुंबई। यौन उत्पीडन की शिकार नर्स अरुणा शानबाग ने सोमवार सुबह 8ः30 बजे दम तोड़ दिया। अरुणा के अंतिम दर्शन के लिए उनका पार्थिव शरीर केईएम अस्पताल में रखा गया है। अस्पताल में उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा हुआ है। फिल्म इण्डस्ट्री से भी लोगों ने अरुणा के लिए ट्वीट किया है। मशहूर संगीतकार विशाल डडलानी ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि वह बहादुर थीं, इस व्यवस्था पर नाराज हूं भगवान उनकी आत्मा को शांति दे । अरुणा अस्पताल में रेप का शिकार होने के बाद से ही कोमा में थी। पिछले पांच दिनों से उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। 66 वर्षीय अरुणा पिछले 42 साल से जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही थी। किंग एडवर्ड मेमोरियल (केइएम) अस्पताल के डीन अविनाश सुपे ने बताया था कि वह निमोनिया से पीड़ित थी।

पिछले वर्ष अरुणा को सप्ताह भर आइसीयू में रखने के बाद नगर निगम संचालित केइएम अस्पताल के नवीनीकृत कमरे में स्थानांतरित किया गया था। केइएम अस्पताल परेल में स्थित है। अस्पताल का स्टाफ ही उनकी देखभाल कर रहा था। अरुणा पर 27 नवंबर 1973 को अस्पताल के एक सफाईकर्मी ने बेरहमी से हमला किया था और दुष्कर्म किया था। उन्हें इसका गहरा सदमा पहुंचा था और वे कोमा में चली गई थी। हादसे के 27 साल बाद सन् 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा की मित्र पिंकी बिरमानी की ओर से दायर इच्छामृत्यु याचिका को स्वीकारते हुए मेडिकल पैनल गठित करने का आदेश दिया था। हालांकि 7 मार्च 2011 को कोर्ट ने अपना फैसला बदल दिया था।

इस मामले के मुख्य घटनाक्रम इस प्रकार हैंः-

वर्ष 1966ः कर्नाटक के शिमोगा स्थित हल्दीपुर की रहने वाली अरुणा ने मुंबई के केइएम अस्पताल में नर्स के तौर पर काम शुरू किया।

27 नवंबर 1973ः 24 वर्षीय अरुणा पर अस्पताल के एक सफाईकर्मी सोहनलाल भरता वाल्मीकि ने बर्बर यौन हमला किया। उसने अरुणा के गले में कुत्ते को बांधने वाली जंजीर लपेटी और उसे कस दिया। ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित होने से अरुणा के दिमाग को गंभीर क्षति पहुंची।

28 नवंबर 1973ः एक सफाईकर्मी ने अरुणा को रक्तरंजित अवस्था में बेहोश पड़े हुए पाया। अस्पताल की नर्सों ने अतिरिक्त सुरक्षा और काम के लिए बेहतर शर्तों की मांग करते हुए तीन दिन की हड़ताल की।

वर्ष 1974ः सोहनलाल को हत्या के प्रयास और अरुणा के कानों की बालियां छीनने के जुर्म में सात साल की सजा सुनाई गई।

वर्ष 1998ः पत्रकार और लेखिका पिंकी विरानी को अरुणा को एमआरआइ कराने के लिए जसलोक अस्पताल ले जाने की अनुमति मिली। बहरहाल डॉक्टरों के यह आशंका जताने पर अनुमति वापस ले ली गई कि इससे अरुणा की मौत भी हो सकती है।

इसी साल, पिंकी विरानी द्वारा लिखी गई किताब अरुणाज स्टोरी, द ट्रू एकाउंट ऑफ ए रेप एंड इट्स ऑफ्टरमॅथ प्रकाशित हुई।

18 दिसंबर 2009ः सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा को दया मत्यु देने के लिए पिंकी विरानी की याचिका विचारार्थ स्वीकार की।

24 जनवरी 2011ः कोर्ट ने अरुणा की जांच करने के लिए मुंबई के तीन प्रख्यात डॉक्टरों जे.वी. दिवातिया, रूप गुरूशानी और निलेश शाह का एक दल गठित किया। दल से अरुणा की शारीरिक और मानसिक हालत पर रिपोर्ट देने को कहा गया।

केइएम अस्पताल के डीन डॉ संजय ओक ने अरुणा को इच्छा मत्यु देने के खिलाफ एक बयान जारी किया।

17 फरवरी 2011ः डॉक्टरों के दल ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी।

18 फरवरी 2011ः कोर्ट ने तीनों डॉक्टरों को दो मार्च 2011 को अपने समक्ष पेश होने को और रिपोर्ट में प्रयुक्त किए गए तकनीकी संदर्भों को समझाने तथा इच्छा मत्यु पर राय देने के लिए कहा।

दो मार्च 2011ः कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा।

सात मार्च 2011ः कोर्ट ने अरुणा को दया मत्यु देने की अपील खारिज की। कोर्ट ने अत्यंत दुर्लभ परिस्थितियों में परोक्ष मृत्यु की अनुमति दी।

18 मई 2015ः आज के दिन अरुणा सदा-सदा के लिए इस दुनिया से विदा हो गई।

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