सरकार को किसान के लिए करना क्या था और कर क्या रही है

राजेश्वर दयाल वत्स

राजेश्वर दयाल वत्स

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों और उसके विरोध में प्रचंड होते किसान आंदोलन ने अचानक देश.दुनिया का ध्यान गांव,खेत, फसल आदि पर केंद्रित कर दिया है। जैसे.जैसे सरकार की हठधर्मिता बढ़ती जा रही है, वैसे.वैसे किसान का आक्रोश भी बढ़ता जा रहा है। भारत की आबादी का अधिकांश हिस्सा प्रत्यक्ष या परोक्ष खेती. किसानी से जुड़ा है और वे किसान की दुर्दशा से दुखी है। अतः आप कह सकते है कि आज भारत की बहुसंख्यक जनता इस आंदोलन से नैतिक और भावनात्मक रूप से जुड़ी है और सरकार के रवैये से दुखी है।

आज देश में किसान और उपभोक्ता दोनों ही परेशान हैं कि एक को उसकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल रहा जबकि दूसरे को वही चीज बेहद महंगे दामों पर मिल रही है। इधर शहरी लोग जगह.जगह हो रहे ट्रैफिक जाम के कारण परेशान है लेकिन सरकार पता नहीं किन सपनों में खोई है।क्रूर मजाक तो यह है कि सारे राजनीतिक दल बारी.बारी से किसानों को बेवकूफ बनाते हैं और घुमा.फिरा कर देसी विदेशी दैत्याकार पूंजी वाली कंपनियों के कारिन्दों की तरह कुतर्क करते हैं। बस होता इतना है कि सत्ता या विपक्ष में होने के साथ अपनी सुविधानुसार इनके डायलॉग बारी. बारी से बदलते रहते हैं। भाजपा के मंत्री गत दिनों कूद.कूद कर बता रहे थे कि देखो यही कानून  कांग्रेस भी ज्यों का त्यों  लागू करना चाहती थी। अब हमने लागू कर दिया तो ये विरोध क्यों कर रहे हैं। भैया वे चोर थे तो क्या तुम भी चोर हो।

भारत में संसार की सभी तरह की जलवायु और मिट्टी पाई जाती है अर्थात विश्व की सब तरह की फसलें भारत में उगाई जा सकती हैं। इसके बावजूद भारत का किसान बदहाल है। कभी दलहन तो कभी तिलहन तो कभी प्याज कभी चीनी आदि की देश में अचानक कमी हो जाती है और महंगाई बेलगाम हो जाती है फिर सरकार को महंगे रेट पर यह चीजें आयात करनी पड़ती है। दूसरी तरफ कभी इनमें से किसी फसल की बहुतायत हो जाती है और किसान को अपनी फसल सड़क पर फेंकनी पड़ती हैं ।

जब तक विदेशों से यह चीजें भारत पहुंचती हैं तब तक नई फसल आ जाती हैं और अक्सर यह आयातित चीजें बंदरगाहों पर सड़ती हैं या भ्रष्टाचारी और कालाबाजारी गिरोह दबाकर दावत उड़ाता है।बाढ़, सूखा, जंगली पशु, ओलावृष्टि, पटवारी, पुलिस, साहूकार, बदमाश व्यापारियों, चीनी मिल मालिकों से लड़ता.झगड़ता, लुटता .पिटता, बचता.बचाता, जैसे तैसे भारतीय किसान अपनी मेहनत और जिजीविषा के बल पर हर साल रिकॉर्ड तोड़ उत्पादन कर दिखाता है। इतना उत्पादन कि भयंकर रूप से  बढ़ती जनसंख्या के लिए भी अनाज कम नहीं पड़ता। ऐसी स्थिति में सरकार और समाज को किसान का अभिनंदन करना चाहिए था उसे पुरस्कार देना चाहिए था पर उसे मिल रहा तिरस्कार है और वह धक्के खाते. खाते हताश परेशान हैं।

एक तरफ लगातार किसानों की बढ़ती आत्महत्याओं के समाचार और दूसरी तरफ हर साल भंडारण की व्यवस्था ना होने के कारण लाखों टन अनाज भीगने, सड़ने के समाचार। पता नहीं बरसों से आती.जाती सरकारों में बैठे सफेदपोशों को यह समाचार देखकर कभी चिंता या शर्म का एहसास हुआ है या नहीं, क्योंकि इस परिदृश्य में मौजूदा सरकार जो तथाकथित तीन क्रांतिकारी कृषि कानून लेकर आई है उससे तो समस्या के और विकराल होने के आसार हैं।वास्तव में सरकार को करना यह चाहिए था कि वह जलवायु और जैव विविधता के अनुसार किसानों को फसल बोने के लिए प्रेरित करती और प्रशिक्षण देती ।

इसी के साथ सूचना संचार तकनीक का लाभ देते हुए किसानों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार का विश्लेषण करते हुए यह अग्रिम सूचना और चेतावनी उपलब्ध कराती कि अमुक फसल बोने से लाभ होगा और अमुक फसल बोने से हानि। सरकार को करना चाहिए था कि वह देश की आवश्यकताओं के अनुसार नए कृषि विज्ञान को जन्म देती और फसलों से पेट्रोल के विकल्प के तौर पर प्रयोग हो सकने वाले इथेनॉल जैसे पदार्थों के उत्पादन की ओर ध्यान देती और किसानों को आवश्यकतानुसार नई फसलें बोने के लिए प्रशिक्षित करती। सरकार क्यों नहीं अपने वैज्ञानिकों को इस काम में लगाती कि वे बेकार जाते कृषि पदार्थों का सदुपयोग करके कपड़ा, कागज, कप..प्लेट, फर्नीचर, सड़क और भवन निर्माण में प्रयोग करने की विधि विकसित करें।

मुझे पक्का यकीन है कि हमारी सरकारें ऐसे काम कभी नहीं करेंगी क्योंकि इसमें कमीशन कहां से आएगा। यह लगातार मेहनत करने वाले कार्य हैं और आकाओं को अगले इलेक्शन से पहले अपना खाने.पीने का कोटा पूरा करना है। वैसे भी जब उद्योगपतियों से मोटा चंदा लेकर महंगे से महंगा चुनाव लड़ने का शौक हो तो फिर उनको रिटर्न गिफ्ट देना भी तो बनता है।इसी के साथ सरकार का कर्तव्य था कि वह किसानों की लागत घटाने के लिए उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुसार खेती करने के लिए प्रेरित करती। उसे अंधाधुंध तरीके से विदेशी बीज, दवाई, मशीन के जंगल में भटकने के लिए ना छोड़ती बल्कि स्वदेशी तकनीक और कार्यप्रणाली विकसित करने में उसकी मदद करती ताकि वह आत्मनिर्भर बनता।सरकार को सहकारिता आधारित, अमूल जैसी संस्थाओं को गांवों में विकसित करना चाहिए था ताकि किसान की मार्केटिंग बेहतर होती।

सरकार से उम्मीद थी कि वह किसानों को बाढ़ और सूखे से बचाने के उपाय करेगी।सरकार को चाहिए था कि वह गांव में कृषि आधारित लघु एवं कुटीर उद्योगों को विकसित करने में मदद देती ताकि गांव में ही रोजगार के अवसर पैदा होते और किसानों के बच्चे प्रवासी मजदूर बनकर शहरों की ओर पलायन ना करते। सरकार का कर्तव्य है कि वह किसानों की उपज का उचित मूल्य निर्धारण करे और उसकी खरीद गारंटी दे लेकिन अब सरकार अपने इस कर्तव्य से पल्ला झाड़ कर भागना चाहती है और किसान को बाजार के रहमो.करम पर छोड़ देना चाहती है। इसी के साथ वह बाजार में बड़ी.बड़ी कंपनियों के एकाधिकार वाले स्पेशल बाजार ही निर्मित करने जा रही है। वह आवश्यक वस्तु अधिनियम में बदलाव करके बड़े पूंजीपतियों को किसी भी फसल के असीमित भंडारण की अनुमति दे रही है। क्योंकि किसी के पास संतोषजनक उत्तर नहीं है।सरकार भारतीय कृषि व्यवस्था को यूरोपीय कृषि व्यवस्था की तरह संचालित करना चाहती है इसलिए वह बड़ी.बड़ी कंपनियों की मार्फत कॉर्पोरेट फार्मिंग को बढ़ावा देना चाहती है जबकि भारत की परिस्थितियां यूरोप या अमेरिका जैसी नहीं है। वहां के किसान को हमारे यहां के मुकाबले 200 प्रतिशत ज्यादा सब्सिडी मिलती है और केवल 2 से 3 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर हैं और उनका जोत क्षेत्र हजारों एकड़ में होता है और सारा काम स्वचालित मशीनों द्वारा किया जाता है।

सरकार को यह करना चाहिए

सरकार को करना यह चाहिए था कि वह किसान की आय बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से उसे खेती के साथ.साथ पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, कृषि आधारित हैंडीक्राफ्ट, फूड प्रोसेसिंग, बागवानी, आयुर्वेदिक औषधि आदि की ओर लेकर जाती। उसे जैविक खेती, देसी खाद बीज अपनाने के लिए प्रेरित करती। उसे अनावश्यक रूप से महंगी और विनाशकारी कंबाइन हार्वेस्टर जैसी गेहूं धान काटने वाली मशीनों का प्रयोग करने से रोकती ताकि पराली जलाने जैसी समस्याएं ना आती। उसे सरकारी बाबूओं, पटवारियों, पुलिस के शोषण से बचाती और भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुकदमों के लिए चक्कर काटते हुए बर्बाद होने से बचाने के उपाय करती। फसल बीमा के नियमों को सरल, तार्किक और किसान हितेषी बनाती।

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कृषि में सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक प्रयोगों को बढ़ावा देती ताकि डीजल और बिजली पर किसान की निर्भरता कम होती और उसकी कृषि लागत कम होती।लेकिन सरकार कर यह रही है कि वह किसान को समझा रही है कि देखो मियां तुमसे ना हो पाएगा। तुम खेती छोड़ दो, देखो यह बड़ी.बड़ी स्मार्ट कंपनियां बहुत बढ़िया ढंग से इंटेलिजेंट खेती करेंगी। तुम बस अपनी जमीन का किराया लो या इनके यहां नौकरी पकड़ो और खामोश रहो। जो छूट दशकों से देश में किसान को हासिल है कि वह कहीं भी जाकर अपनी फसल बेच सकता है। उसे भी सरकार अपनी नई उपलब्धि बता रही है जबकि किसान के लिए यह बहुत मुश्किल और खर्चीला हो जाता है कि वह अपनी फसल लादकर बहुत दूर स्वयं बेचने जाए।

होना यह चाहिए कि उसके आसपास ही मंडी विकसित हो। होना यह चाहिए था कि सरकार खुली प्रतिस्पर्धा वाली लेकिन किसी पूंजीवादी गिरोह के एकाधिकार से मुक्त सरकारी मंडियां ज्यादा से ज्यादा विकसित करती लेकिन अब तो बची. खुची मंडियों को भी समाप्त करके की साजिश चल रही है। बिहार जैसे राज्यों में जहां सरकारी मंडियों की व्यवस्था कुछ दशक पहले समाप्त कर दी गई थी। आज वहां के किसानों की हालत की तुलना पंजाब, हरियाणा के किसानों से ;जहां अभी यह व्यवस्था बची हुई है, करके देख लो सारी फिल्म समझ में आ जाएगी। 

गत 50 वर्षों में सांसदों विधायकों के वेतन और भत्ते, सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान और निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा तैयार उपभोक्ता वस्तुओं और यहां तक की दवाइयों, स्कूल की फीस आदि आदि में कितने गुना वृद्धि हुई है और उसके अनुपात में किसान की फसल के दाम कितने बढ़े हैं, इसकी तुलना कोई नहीं करना चाहता। किसान को मिलने वाली सब्सिडी और कभी.कभी होने वाली कर्ज माफी के आंकड़े सभी पेश करते हैं लेकिन इसके बदले किसानों की जमीन पर सरकारी डाके और उद्योगपतियों को मिलने वाले इंसेंटिवए करों में छूटए लोन की सुविधा और फिर उस लोन को जानबूझकर डकार जाने के आंकड़ों की बात कोई नहीं करता।

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एक अनुमान के अनुसार यदि सरकार अपने द्वारा निर्धारित 2016 के एमएसपी पर सभी किसानों की केवल 24 फसलों को पूरा खरीदने का वायदा निभाए तो उसे प्रतिवर्ष किसानों को तीन लाख करोड रुपए अदा करने पड़ेंगे। अब इसके बदले सरकार किसान सम्मान निधि का झुनझुना बजाकर अपना किसान हितेषी बनने का ऐतिहासिक दावा ठोक रही है।एक एकड़ का किसान भी प्रतिवर्ष लगभग 25 लाख रुपए की ऑक्सीजन हमें फ्री में गिफ्ट करता है। देश की सीमा पर शहीद होने वाले सैनिक भी अधिकतर इन्हीं के सपूत होते हैं। इन्हीं किसानों ने गरीबों के लिए विनोबा भावे के भूदान यज्ञ में लगभग तीन लाख हेक्टेयर जमीन दान दी थी।

किसान भारत की अर्थव्यवस्था का सबसे मजबूत पहिया ही नहीं बल्कि इसी के साथ पर्यावरण और प्रकृति चक्र का भी सबसे अनमोल पहिया है। बिजली, इंटरनेट, मेट्रो, पेट्रोल, कार, सरकार, क्रिकेट, फैशन, फिल्म आदि सब समाप्त हो जाए, नष्ट हो जाए तो भी मनुष्य जीवित रह सकता है लेकिन किसान द्वारा पैदा किया गया अन्न मिलना बंद हो जाए तो मौत निश्चित है। अतः केवल सरकार द्वारा जारी होने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करने वाले किसान को हिकारत से नहीं प्यार और सम्मान के साथ देखिए, सुनिए और उसकी समस्या का समाधान कीजिए। एक किसान का अपनी मिट्टी से क्या रिश्ता होता है। वह किस जुनून से खेती करता है। इसे समझे बिना आप उसके दर्द को समझ नहीं सकते।

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