मातृभाषा की शिक्षा, परीक्षा की व्यवस्था में आवश्यकता

अरुण कुमार जैमिनी

नई दिल्ली

केंद्रीय हिंदी संस्थान, विश्व हिंदी सचिवालय और वैश्विक हिंदी परिवार द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ के अवसर पर परिचर्चा का आयोजन किया गया l पहले सत्र का विषय – ‘देश में मातृभाषा सरंक्षण की चुनौतियां’ था l कार्यक्रम का संचालन संस्थान के क्षेत्रीय निदेशक गंगाधर वानोडे ने किया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में पंजाब के भूतपूर्व मुख्य सचिव निर्मल सिंह कलसी, त्रिपुरा वि. वि. की डॉ मिलन रानी,  अखिल भारतीय मराठी साहित्य मंडल के पूर्व अध्यक्ष डॉ श्रीपाद भालचंद्र जोशी,  महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जी गोपीनाथन,  ‘संकल्प’ के संस्थापक संतोष तनेजा उपस्थित थे। सानिध्य वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव का था।  

इस अवसर पर बोलते हुए निर्मल सिंह कलसी ने कहा कि यदि मातृभाषा का आधार मजबूत हो तो अन्य किसी भी भाषा को सीखने में कोई दिक्कत नहीं आती है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष 13 भाषाओं में सबसे प्रतिष्ठित जेईई की परीक्षा मातृभाषा में देने का अवसर प्राप्त हुआ है।

भारतीय भाषाओं को परीक्षाओं एवं शिक्षा व्यवस्था में स्थापित करने के विषय में किए जा रहे निरंतर संघर्ष के विषय में संतोष तनेजा के प्रति आभार प्रकट करते हुए संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल जोशी ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस गंभीर मामले को समझाने में संतोष जी की भूमिका के लिए कोई धन्यवाद नहीं दिया जा सकता, जिसके परिणामस्वरुप राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं में शिक्षा संबंधी इन प्रावधानों पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है।

संतोष तनेजा ने  इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषाओं पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है किंतु आश्चर्य व्यक्त किया कि समाज में हिंदी एवं मातृभाषाओं के प्रति इतनी उपेक्षा है कि अनेक राज्यों में बारहवीं कक्षा में विज्ञान की पढ़ाई मातृभाषा में नहीं होती है।

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डॉ. मिलन रानी जमातिया ने कहा कि पूर्वोत्तर में 50 से अधिक बोलियाँ हैं और 200 से अधिक जन जातियाँ हैं। उन्होंने गंभीर मुद्दा उठाते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में सैकड़ों भाषाएँ विलुप्त हो चुकी हैं और सैकड़ों विलुप्ति के कगार पर हैं क्योंकि इनकी कोई व्यवस्थित लिपि एवं व्याकरण नहीं हैं।

परिचर्चा को आगे बढ़ते हुए प्रो. जी गोपीनाथन ने गाँधी जी को उद्धृत करते हुए कहा कि वे मातृभाषा को माँ के दूथ के समान मानते थे। देश के हर विद्यार्थी को अपनी मातृभाषा की जानकारी होनी चाहिए और साथ ही अन्य प्रांतों के साथ वार्तालाप के लिए उन्हें हिंदी सिखाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए और इसके लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग किया जाए।

श्रीपाद भालचंद्र जोशी ने कहा कि पिछले दशकों से वे आंदोलनरत हैं कि मराठी को बारहवीं तक की पढ़ाई में अनिवार्य किया जाए लेकिन सरकारों की मंशा साफ नहीं होती। इस सरकार ने पहली बार क्रांति मैदान के आंदोलन के समक्ष विवश होकर दसवीं तक मराठी शिक्षण की व्यवस्था की है।

कार्यक्रम का समाहार करते हुए वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने कहा कि वे मानते हैं कि बिना जन आंदोलन बनाए भाषा के प्रश्न को हल नहीं किया जा सकता और उन्होंने भारत के राष्ट्रपति से यह अनुरोध किया है कि वे संसद का विशेष अधिवेशन बुलाएं, जिसमें भारत के भाषाई संकट पर चर्चा हो। डॉ राजेश कुमार ने सभी का आभार व्यक्त किया l

कार्यक्रम के दूसरे सत्र का विषय था– ‘विदेशों में मातृभाषा संरक्षण चुनौतियां’।   कार्यक्रम का संचालन करते हुए संयोजक डॉ राजेश कुमार ने सभी भाषा प्रेमियों का स्वागत किया। डॉ॰ नवेन्दु बाजपेयी वक्ताओं का स्वागत करते हुए संक्षिप्त परिचय कराया।

पाकिस्तान में जन्मी डॉ॰ ताहिरा नक़वी ने इस कार्यक्रम से जुड़कर खुशी जाहिर करते हुए मादरी जुबान को कुदरत की देन बताया। उन्होने बताया कि उनके विभाग में पंजाबी, बंगला और अंग्रेजी आदि अनेक मातृभाषाओं वाले विद्यार्थी आते हैं जिनके लिए वर्णमाला से शुरू होकर उच्च स्तर तक के पाठ्यक्रम चलते हैं। मिली-जुली कक्षाएं होती हैं। बँगलादेश से भी काफी छात्र आते हैं। हम शायरी में गालिब और इकबाल आदि का सहारा लेकर भी समझाते हैं। बहुत से लोग बालीवुड को समझने के लिए भी उर्दू सीखते हैं।

पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय के मराठी विभाग के प्राध्यापक डॉ मिलिंद रानडे ने कहा कि पिछले सोलह वर्षों से उनके अनुभव में आया है कि अनेक प्रयोजनों की सिद्धि हेतु विद्यार्थी मराठी और हिन्दी पढ़ने आते हैं और लाभान्वित होते हैं। यहाँ विद्यार्थी न होने पर विभाग के बंद होने का खतरा होता है जैसा कि ग्रीक, वियतनाम और कोरियन भाषा  के साथ हुआ है।

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पेंसिलवेनिया विश्वविद्यालय अमेरिका में संस्कृत के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ॰ देवेन पटेल ने कहा की उनकी कक्षाओं में भिन्न- भिन्न मातृभाषा वाले विद्यार्थी आते हैं जिन्हें वे नई तकनीकी का सहारा लेकर समझाते हैं।

शिक्षा–संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव अतुल कोठारी ने कहा कि बच्चे घर में मातृभाषा नहीं बोलते हैं तो इसके लिए माता-पिता और परिवार ही दोषी है। उन्होने अमेरिका के अपने संस्मरण सुनाए, जिसमें माता-पिता द्वारा घर में मातृभाषा का प्रयोग करने पर स्वतः ही वहाँ बच्चे सीख गए। इसके लिए जागरूकता आवश्यक है।

केंद्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी ने कहा कि तकनीकी क्षेत्र में हिन्दी व भारतीय भाषाओं के लिए सरकारी तौर पर कार्य बल या टास्क फोर्स का गठन सराहनीय है। आज के वक्ता डॉ कलसी, संतोष जी एवं मुझे इस ‘टास्क फोर्स’ का सदस्य होने के कारण सेवा करने का मौका मिला है।

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