क्या ससुराल ही बेटियों का असली घर है?

प्रियंका आनंद

हर माता पिता का सपना होता है कि उनकी बेटी को जिन्दगी की हार खुशी मिले और इसी कोशिश में वो अपना सारा जीवन व्यतीत कर देते है। वह हमेशा यही कोशिश करते है कि अपनी बेटी को दुनिया की हर खुशी से अवगत कराए। इसी सपने के साथ वह अपनी बेटी को किसी पराय व्यक्ति से उसकी शादि करवा कर उसकी सारी जिन्दगी के लिए सौप देते है और यह हमारे देश का परंपरा भी है। शुरु से हर माता पिता अपनी बेटी को यही संस्कार देते है की ससुराल में उसको अपने माता पिता के सम्मान को बनाए रखना है। अपने माता पिता की इस सिख को अपना धर्म मान कर वह सारी जिंदगी इसी कोशिश में रहती है कि कैसै भी करके उसके माता पिता का मान सम्मान बरकरार रहे। अगर उस लडकी को ससुराल में मान सम्मान मिलता है तो उसके माता पिता के साथ उस लडकी को भी खुशी रहती है और अगर कही दुरभार्ग्यवष वह अपने ससुराल में किसी भी कारण दुखी रहती है तो उसके अलावा माता पिता को भी दुखों का सामना करना पडता है। अपने माता पिता के सम्मान के कारण वह यह भी भुल जाती है कि जो उसके साथ ससुराल में हो रहा होता है वह सही है भी या नही या फिर यू कहे कि अपने साथ कुछ गलत होता देखकर और समझकर भी वह उन सारी बातों को नजरअंदाज कर देती है।


सुख और दुख हर विवाहित जीवन के दो पहलु होते हैं। दुखी होने पर हर माता पिता अपनी बेटी को यह सलाह अवश्य देते है कि समय के साथ साथ सब ठिक हो जाता है या यूं कहे कि वह अपनी बेटी को यह जरुर कहते है कि हम उसके ससुराल वालों से बात करके सब ठिक करने की कोशिश करेंगे। लाख दुखों के बावजुद भी उनकी यह सलाह लडकी को ना चाहते हुए भी अपने ससुराल में रहने को मजबुर कर देती है। ना चाहते हुए भी उसे अपने में ससुराल ही रहना पड़ता है क्योंकि हम जिस समाज में हम रहते है उस समाज मे हमें यही सिखाया जाता है कि शादी के बाद ससुराल ही लडकी का असली घर होता है और अब उसे सारी जिन्दगी यही रहना है फिर चाहे वो सुखी हो या फिर दुखी। हमारे देश में ना जाने एसी कितनी लडकियॉ है जो ना चाहते हुए भी अपने मां बाप की इस सिख को अपना धर्म मान कर वह सारी जिंदगी इसी उम्मीद के साथ गुजार देती हैं कि कभी तो उसके जीवन में खुशियॉ आऐगी या अखिर कभी तो इसे अपने ससुराल में मान सम्मान मिलेगा। लेकिन दुभाग्यवश एसा नही होता। जिसके चलते बहुत ही लड़कियां परेशानियों को ढोते ढोते खुदखुशी तक कर लेती हैं।


यहां सवाल यह उठता है कि क्या सामज की खुशी किसी भी लड़की की जिन्दगी से बढ़ कर हो सकती है , कि क्या ना चाहते हुए भी आखिर क्यों लड़की को ससुराल में रहने को मज़बूर होना पड़ता है और आखिर क्यों हमारे देश की लड़कियों को अपने माता पिता की खुशियों की खातिर आत्महत्या तक करनी पड़ सकती है? आखिर क्यों माता पिता अपनी बेटी को ससुराल में खुश ना होते हुए भी वहां रहने पर मजबुर करते है? क्यों एक बेटी अपने माता पिता के साथ सारी जिन्दगी नही रह सकती? हमे अपनी सोच बदलने की है। यह ज़रूरी नहीं कि किसी भी लड़की को ससुराल में ही रहना हो। यदि हालात ठिक नहीं है तो वह अपने अभिभावकों के साथ और फिर अपने पैरों पर खड़े हो कर अपना जीवन अकेले भी रहे सकती है। ऐसे में परिवार को चाहिए कि अपनी बेटी का साथ दे ताकि अपने जीवन की वह एक नई शुरूआत कर सके और इस प्रकार के समाज और लोगों के लिए एक उदाहरण बने जो महिलाओं के लिए सिर्फ यह सोच रखते हैं कि परेशानी के बावज़ुद भी ना चाहते हुए केवल और केवल ससुराल ही एक मात्र विकल्प है।

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