सिखों की नाराज़गी बनी इंदिरा गांधी की जान की दुश्मन

 आज का दिन / नेहा राठौर

आज ही के दिन यानी 6 जनवरी 1989 को हमारे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मारने वाले उनके सुरक्षा कर्मियों को फांसी दी गई थी। इंदिरा गांधी की हत्या के पीछे का कारण हर किसी को मालूम होगा, लेकिन हैरत की बात यह भी है कि प्रधानमंत्री को अपने मरने का पहले से ही आभास हो गया था। प्रधानमंत्री की करीबी दोस्त पुपुल जयकर ने अपनी किताब “ इंदिरा गांधी एक बायोग्राफी” में इस बात का ज़िक्र किया है। ऑपरेशन ब्लु स्टार के बाद से ही इंदिरा गांधी की सुरक्षा को बढ़ाने का फैसला लिया गया था, लेकिन उन्होंने अपनी सुरक्षा कर्मियों को बदलने से यह कहकर मना कर दिया कि वह कुछ लोगों डर से बाकी के सिखों पर शक नहीं किया जा सकता।

उसके कुछ दिन बाद ही उनके दिल्ली में स्थित सरकारी आवास पर सुरक्षा में लगे सुरक्षा कर्मी सतवंत सिंह, बेअंत सिंह और केहर सिंह ने उन्हें गोली मार दी। केहर सिंह को मौके पर ही गोली मार दी गई और बाकी के दो यानी सतवंत सिंह और बेअंत सिंह को तिहाड़ भेज दिया गया। तिहाड़ जेल में ही उन्हें 6 जनवरी 1989 को तिहाड़ में ही फांसी दी गई।

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ब्लु स्टार ऑपरेशन

ब्लु स्टार ऑपरेशन के बाद से देश का सिख समुदाय इंदिरा  गांधी से खफा हो गया था।  एक ऑपरेशन ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। इस ऑपरेशन से पहले एक बार भी पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से सलाह नहीं ली गई और न ही उन्हें इसकी जानकारी दी गई। जनरल सिंह भिंडरावाले द्वारा चलाए गए खालिस्तान की मांग की की वजह से 1980 से 1984 तक पंजाब में ख़ौफ़ का माहौल बन गया था। कहते है कि आपातकाल के बाद 1977 के चुनावों में भारी हार के बाद खुद कांग्रेस पार्टी भिंडरावाले को लाई थी। उस समय पार्टी को लगता था कि पंजाब में सरकार बनाने के लिए उन्हीं के बीच का कोई इंसान होना चाहिए जो सिखों हो और जो पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनाने में मदद करे। भिंडरावाले के आने के बाद 1980 में कांग्रेस पार्टी ने भारी मतों से जीत हासिल की।

उसके बाद से भिंडरावाले के तेवर बदल गए और उसने पंजाब में अपने नाम का डर लोगों में बनाना शुरु कर दिया। बात यहां तक पहुंच गई कि भिंडरवाले के आदमियों ने एक पुलिस अफ्सर को गुरूद्वारे से बाहर आते समय गोलियों से भुन दिया लेकिन किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई, कि उस अफसर की लाश को वहां से उठा सके। लाश बहुत देर तक वहीं पड़ी रही, फिर पंजाब के पुर्व मुख्यमंत्री दरबारा सिंह तक यह बात पहुंची, लेकिन वह भी डर से कुछ नहीं कर पाए। आखिरकार, उन्होंने भिंडरवाले को फोन कर वहां से लाश उठाने की इजाज़त मांगी तब जाकर उस अफसर को वहां से उठाया गया।

भिंडरवाले अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के अकाल तख्त पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था और वहीं छिपाकर हथियार मंगाने लगा ताकि अगर फौज वहां आए तो उसका समना कर सके। प्रधानमंत्री होने के नाते इंदिरा गांधी पर दवाब बढ़ने लगा था। इसलिए प्रधानमंत्री ने ऑपरेशन ब्लु स्टार को शुरू करने का आदेश दिया जिसके बारे में कम ही लोग जानते थे। इस ऑपरेशन में फौज ने स्वर्ण मंदिर पर गोलिबारी शुरू कर दी। जिसमें भिंडरावाले और उसके साथी मारे गए और इसमें कुछ भारतीय फौज के जवान भी शहीद हुए। जवानों ने वहां से कई हथियार भी बरामद किए।

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इस ऑपरेशन में स्वर्ण मंदिर तहस-नहस हो गया। वहां की लाईब्रेरी में आग लगने से सारी किताबें जल कर खाक हो गई। इस ऑपरेशन के बाद से सिखों में इंदिरा गांधी के प्रति गुस्सा भरा गया था। गुस्सा इतना था कि सिखों ने सरकार द्वारा मंदिर को ठिक कराने के लिए दी जा रही मदद के लिए भी मना कर दिया। यही कारण है कि अपने गुस्से के चलते इन्द्रिरा गांधी के सिख सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें गोली मार दी और उन सिखों को अपनी इस गलती का कोई पछतावा भी नहीं था। 

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