Sunday, July 21, 2024
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391वीं शिवाजी जयंती

नेहा राठौर

भारत के इतिहास में इस धरती पर कई सपूतों ने जन्म लिया और अपने देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर गए। इन वीरों में छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम भी शामिल है। आज के दिन शिवाजी की 391वीं ज्यंती है। शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। आज के दिन को महाराष्ट्र में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। 

साल 1869, में ज्योतिराव फुले ने रायगढ़ पर पहली बार शिवाजी की समाधि की खोज की थी और उसपर अपने जीवन का पहला और सबसे लंबी गाथा लिखी थी। शिवाजी जयंती की शुरुआत लोगकमान्य तिलक ने 1895 में पुणे में पहली घटना के साथ की थी। उसी समय इनकी जयंती का बड़े पैमाने पर विस्तार किया गया था।

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शिवाजी एक महान देश भक्त होने के साथ ही एक कुशल प्रशासक भी थे। देश के इस वीर ने कभी मुग़लों और अंग्रेजों के सामने अपना सर नहीं झुकाया। उन्होंने 1670 में मुग़लों की सेना के साथ जमकर लोहा लिया और मुग़लों को हराकर सिंहगढ़ के किले पर अपना झंड़ा लहराया था। 

कुशल रणनीतिकार

सिंहगढ़ पर कब्ज़ा करने के बाद उन्होंने ही मराठा साम्राज्य की नींव रखी थी। कुछ लोग शिवाजी का जन्म 1927 में बताते है। शिवाजी के पिता शाहजी भोसले एक सेनापति थे और उनकी मां जीजाबाई धार्मिक स्वभाव वाली थी। शिवाजी का बचपन का नाम शिवाजी भोसले था, उनका सारा बचपन धार्मिक ग्रंथ सुनते सुनते बीता था। उनके अंदर छोटी उम्र से ही शासक वर्ग की क्रूर नीतियों के खिलाफ लड़ने की अलग सी लौ थी। भारत में शिवाजी को एक महान योद्धा और कुशल रणनीतिकार के रूप में भी जाना जाता है। वह शिवाजी ही थे, जिन्होंने गोरिल्ला वॉर की एक नई शैली विकसित की थी। शिवाजी की मुग़लों से पहली मुठभेड़ 1656-1657 में हुई थी।

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इस मुठभेड़ में उन्होंने मुग़लों को कई सारी संपत्ति और सैकड़ों घोड़ों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया था। शिवाजी ने सकवरवाई, साईं भोसले, पुतलाबाई और सोयारबाई से शादी की थी। उनके 8 बच्चे थे, जिनमें सबसे बड़े संभाजी थे। शिवाजी ने अपने काम काज में फारसी की जगह मराठी और संस्कृत को अधिक प्राथमिकता दी थी। कहा जाता है कि 1680 में किसी बीमारी की वजह से अपनी राजधानी पहाड़ी दुर्ग राजगढ़ा में छत्रपति शिवाजी की मृत्यु हो गई थी। पहले देश में सती प्रथा को बहुत माना जाता था, इस प्रथा को पूरा करते हुए हनुमान जयंती की संध्या में शिवाजी की पत्नी पुतलाबाई उन्हीं के साथ सती हो गई थी। महाराज की मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे संभाजी ने राज्य की कमान संभाली थी।  

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