Monday, April 15, 2024
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क्या पहले राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होना चाहिए था बौद्ध शिखर सम्मेलन ?

Charan Singh Rajput

दुनिया में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से केंद्र सरकार दिल्ली में 20 -21  अप्रैल को वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन करने जा रही है। इस सम्मेलन में 30  देशों के प्रतिनिधि भाग ले रहे हंै। यह सम्मेलन भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ ही महात्मा बुद्ध के शांति के संदेश पर आधारित होना बताया जा रहा है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या हम अपने देश में सांस्कृतिक विरासत और महात्मा बुद्ध के संदेश पर काम कर रहे हैं। क्या दुनिया भर के देशों को बुलाने से पहले यह सम्मेलन अपने देश तक सीमित करते हुए नहीं करना चाहिए था ? क्या देश में सांस्कृतिक विरासत, भाईचारा, देशभक्ति, राष्ट्रीय एकता को लेकर देश के लोगों के एक सम्मेलन की जरूरत आज की तारीख में नहीं है ?

बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे बढ़कर पहले अपने देश के जिम्मेदार लोगों को बुलाकर बौद्ध शिखर करना नहीं चाहिए था ? क्या प्रधानमंत्री देश में महात्मा बुद्ध के शांति के संदेश पर काम कर रहे हैं ? यदि हां तो जाति और धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा पर भाईचारे का संदेश क्यों नहीं देते हैं ? पीएम मोदी ने जाति और धर्म के नाम पर होने वाली हिंसात्मक घटनाओं पर कितनी बार भाईचारे का संदेश दिया है ?

प्रधानमंत्री तो इस तरह के मामले में अपनी जुबान खोलने की जहमत भी नहीं उठाते हैं।  जिस देश में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम का इस्तेमाल हिंसा करने के लिए किया जाने लगे। जिस देश में जय श्री राम के नारे का इस्तेमाल युद्धघोष के रूप में होने लगे। दूसरे धर्म के लोगों को जबर्दस्ती जय श्रीराम का नारा लगवाया जाने लगे। उस देश के प्रधानमंत्री वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन कर रहे हैं । क्या महात्मा बुद्ध ने इस तरह की शांति का संदेश दिया था। इस कार्यक्रम के आयोजकों को देश को बताना चाहिए कि इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से पहले देश में इस ओर कितने प्रयास किये गये ? जो मीडिया दिन भर हिंदू मुस्लिम के नाम पर हिंसा को बढ़ावा दे रहा है वह मीडिया इस सम्मेलन में शांति का संदेश कैसे देगा ? क्या इस सम्मेलन के माध्यम से पीएम मोदी को महात्मा बुद्ध का अनुयायी दर्शाने की कोशिश की जा रही है ? या फिर महात्मा बुद्ध की विचारधारा को भुनाने का यह प्रयास मात्र है।

 

देखने की बात यह है कि भले ही उत्तर प्रदेश में मारे गये गैंगस्टर अतीक अहमद और उसका भाई अशरफ अपराधी रहे हों पर क्या इन दोनों की हत्या करते समय हत्यारोपियों ने जय श्रीराम के नारे नहीं लगाए ? क्या जय श्रीराम के नारे का इस्तेमाल देश में हिंसा करते समय नहीं होने लगा है ? क्या जय श्रीराम के नारे जबर्दस्ती नहीं लगवाये जा रहे हैं ? क्या जय श्रीराम का नारा युद्धघोष के रूप में प्रचलित नहीं होता जा रहा है ? ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने कभी हिंसा का साथ दिया ? क्या राम हिंसा इस तरह की हिंसा के समर्थक थे ? क्या राम सबको साथ लेकर नहीं चलने वाले थे ? क्या प्रधानमंत्री मोदी ने हिंसा में राम के इस्तेमाल होने पर किसी प्रकार की शांति की अपील देश के लोगों से की है ? क्या दूसरे देशों के प्रतिनिधि देश में आकर भारत में होने वाली सांस्कृतिक और धार्मिक हिंसा का मुद्दा नहीं उठाएंगे ? यदि दूसरे देशों के प्रतिनिधि इन मुद्दों को हमारे देश में आकर उठाने लगे तो फिर देश की क्या छवि रह जाएगी ? ऐसे में यह सम्मेलन पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न होकर राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए था और इसमें देश के जाने माने पत्रकार, साहित्यकार, वकील, सत्ता पक्ष के नेताओं के साथ ही विपक्ष के नेता भी बुलाने चाहिए थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर यह चर्चा होनी चाहिए।

दरअसल देश में पहली बार वैश्विक बौद्ध शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे। इसका आयोजन 20 व 21 अप्रैल को दिल्ली के अशोक होटल में होगा, जिसमें 30 देशों के प्रतिनिधियों के भाग लेने की बात बताई जा रही है।

इस सम्मेलन का आयोजन अंतरराष्ट्रीय बौद्ध परिसंघ (आईबीसी) व संस्कृति मंत्रालय कर रहा है। इस सम्मेलन का विषय “समकालीन चुनौतियों का उत्तर दर्शन से लेकर कार्यान्वयन तक” (रिस्पान्सेज टू कंटेम्पररी चैलेंजेस फ्रॉम फिलॉसफी टू प्रैक्सिस) है। सम्मेलन में इस बात पर जोर देने की बात सामने आ रही है कि दुनिया की वर्तमान चुनौतियों का सामना बौद्ध दृष्टिकोण के अनुसार किस प्रकार करे। केंद्रीय संस्कृति एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री जी. किशन रेड्डी के अनुसार 30 देशों के 171 प्रमुख बौद्ध गुरु और अकादमिक जगत के प्रतिनिधि तथा देश के विभिन्न बौद्ध संगठनों के 150 प्रतिनिधि शामिल होंगे।

दिलचस्प बात यह है कि मोदी सरकार में संस्कृति मंत्री को दुनिया में मची हलचल दिखाई दे रही पर अपने देश में नहीं दिखाई दे रही है। ये साहब यह तो कह रहे हैं कि बौद्ध धर्म भारत से पूरे विश्व में पहुंचा है। इसलिए देश का यह प्रमुख कर्तव्य है कि वह बुद्ध के शांति के इन संदेशों को पूरी दुनिया में प्रसारित करे। इन साहब से कोई पूछे कि उनकी सरकार ने देश में कितना बुद्ध का शांति का संदेश पहुंचाया।

मामलों को भुनाने माहिर बीजेपी के मंत्री ने बौद्ध धर्म और संस्कृति के प्रसार के लिए केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले प्रयास भी बताये। उनके अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भगवान बुद्ध से जुड़े कुशीनगर में अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का उद्घाटन किया है। इन साहब का कहना है कि बुद्ध के नाम से एयरपोर्ट बनने पर  दुनियाभर के लोग कुशीनगर सीधे आ सकेंगे। इन साहब को कौन समझाए कि महात्मा बुद्ध के नाम से एयरपोर्ट बनने से क्या उनकी विचारधारा पर काम हो जाएगा ? केंद्र सरकार ने उनके शांति के संदेश पर कितना काम किया है ? क्या धर्मनिरपेक्ष देश में हिन्दू राष्ट्र की बात कर शांति का संदेश चला जाएगा ? क्या इतिहास से छेड़छाड़ कर शांति का संदेश चला जाएगा ? क्या जय श्री राम के नारों के बीच बुद्ध का शांति का संदेश चला जाएगा ?

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