Delhi : अब सबकी जांच परख करने वाली सेबी की भी होगी जांच-पड़ताल 

अपनी पत्रिका ब्यूरो

वैसे तो सेबी विभिन्न कंपनियों के खिलाफ जांच कर रही है पर सहारा सेबी विवाद के चलते सेबी का नाम ज्यादा चर्चा में आया है। अब अडानी ग्रुप को लेकर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद इस ग्रुप के शेयरों के धड़ाम से गिरने और निवेशकों से पैसे मारे जाने की आशंका के बाद भी सेबी के सक्रिय न होने की वजह से सेबी का नाम फिर से चर्चा में आया है। सहारा पर सख्ती बरतने वाली सेबी अडानी ग्रुप और हिंडनबर्ग की रिपोर्ट मामले में शांत रही। विपक्ष के मामले को उठाने के बाद भी सेबी ने इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। सुप्रीम कोर्ट ने अब सेबी को नींद से जगाने के लिए केंद्र सरकार को एक कमेटी बनाने को कहा है। यह कमेटी ऐसे सुझाव देगी कि सेबी को नींद से जगाया जा सके और गंभीर मामलों में उसे नींद न आये।

दरअसल सेबी पर सहारा और अडानी को लेकर भेदभावपूर्ण रवैये का आरोप लगा है। जहां सेबी ने सहारा ग्रुप के खिलाफ जांच कर सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग फाइनेंस कॉरपोरेशन कंपनियों में गड़बड़ी पाये जाने पर सहारा से २५००० करोड़ रुपये जमा करने को कहा है वहीं हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद अडानी ग्रुप को हुए भारी घाटे और निवेशकों के पैसे मरने की अंदेश के चलते भी सेबी ने अडानी ग्रुप मामले में उदासीनता दिखाई। गत दिनों सहारा सेबी पर २५००० करोड़ रुपये होने का दावा करते हुए उसके खिलाफ प्रदर्शन भी कर चुका है। सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय और दूसरे निदेशक और अधिकारी सहारा सेबी के खाते में २५००० करोड़ रुपये होने का दावा करते हुए उसके वापस होने पर सभी निवेशकों के भुगतान की बात कर रहे हैं।
दरअसल कंपनियों के शेयर तीन सौ से तीन हजार पर पहुंच जाते हैं। सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया यानी कि सेबी नींद में रहती है। फिर कोई रिपोर्ट आती है और यही शेयर धड़ाम से गिर जाते हंै। छोटे निवेशकों को बड़ा नुकसान होता है। सेबी फिर भी नींद में रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने सेबी को जगाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को सौंपी है। केंद्र सरकार द्वरा बनाई गई कमेटी यह भी सुझाव देगी कि शेयर मार्केट के रेगुलेटरी मैकेनिज्म में फेरबदल की जरूरत है या नहीं।

दरअसल एमएल शर्मा और विसाल तिवारी वकील ने अडानी ग्रुप पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद अडानी ग्रुप को हुए भारी नुकसान के चलते छोटे निवेशकों को होने वाले नुकसान की चिंता करते हुए हिंडनबर्ग रिसर्च कंपनी पर कार्रवाई की मांग करते हुए जनहित याचिकाएं दायर की हैं। दरअसल ये याचिकाएं हिंडनबर्ग के खिलाफ हैं। इनमें कहा गया है कि इस रिपोर्ट ने देा की छवि धूमिल की है। यही नहीं हिंडनबर्ग ने शेयरों को शार्ट सेल किया, जिससे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है। ऊपर से हिंडनबर्ग के फाउंडर नैथन एंडरसन भी अपने दावों कोई प्रमाण नहीं दे पाये हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब अडानी ग्रुप के साथ प्रधानमंत्री का नाम आ रहा है तो सेबी पर निगरानी रखने के लिए बनाई जाने वाली कमेटी निष्पक्ष रूप से काम कर पाएगी इसकी क्या गारंटी है। वह भी तब जब विपक्ष लगातार अडानी ग्रुप के 609 से ऊपर उठकर दुनिया के दूसरे अमीर बनने के पीछे प्रधानमंत्री के अपने पद का इस्तेमाल करते हुए बढ़ावा देने का आरोप लगा रहा है। मतलब केंद्र सरकार द्वारा बनाई गई ऐसी कौन सी कमेटी होगी जो प्रधानमंत्री की बिना सहमति के कोई काम कर पाएगी ?
दरअसल सेबी पर इसलिए ज्यादा उंगली उठ रही है क्योंकि हिंडनबर्ग रिसर्च ने अडानी ग्रुप को लेकर एक रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में अडानी ग्रुप पर मनी लांड्रिंग से लेकर शेयर मेनीपुलेशन जैसे आरोप लगाये गये थे। रिपोर्ट के बाद ग्रुप के शेयर औंधे मुंह आ गिरे थे। इतना ही नहीं अडानी के साथ कुछ बैंकों के शेयरों की भी बुरी हालत हो गई थी। इसके बाद क्या हुआ देश और दुनिया देख रही है। सड़क से लेकर संसद तक हिंडनबर्ग-अडानी के सिवा कोई दूसरी चर्चा नहीं थी। चर्चा हंगामा और धरना प्रदर्शन यही कुछ चल रहा है देश में।
यह अपने आप में दिलचस्प रहा है कि जहां विपक्ष अडानी ग्रुप पर आक्रामक रहा वहीं बीजेपी अडानी ग्रुप के बचाव में देखी गई। राजस्थान में भाजपा नेताओं ने अडानी को लेकर उल्टे कांग्रेस पर कई आरोप लगा दिये। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अडानी को लेकर आंदोलन करती है। भाजपा के खिलाफ और राजस्थान में उन्हें जमीन खुद बांटती फिर रही है। भाजपा नेता ने कांग्रेस के दोहरे चेहरे को जनता के सामने लाने की बात कही। भाजपा नेता राजेंद्र राठौर ने कहा है कि कांग्रेस सरकार ने राजस्थान में अडानी को पिचासी हजार बीघा जमीन दी है। इस तरह जमीन लुटाओ आप और आरोप लगाएं हम, यह कैसे चलेगा ? राठौड़ यहीं नहीं रुके।
भाजपा ने कहा है कि कांग्रेस सरकार ने राजस्थान में अडानी को पिचासी हजार बीघा जमीन दी है। उन्होंने कहा कि अडानी को कांग्रेस सरकार ने कोयले का सिंगल टेंडर दिया। प्रोक्योरमेंट एक्ट की धज्जियां उड़ाकर सबसे महंगा कोयला खरीदा गया। अडानी के इस महंगे कोयले की वजह से राज्य के हर बिजली उपभोक्ता को सात पैसे प्रति यूनिट का सरचार्ज भुगतना पड़ रहा है लेकिन क्या किया जाए ? कांग्रेस सरकार की भी अपनी मजबूरियां हैं।

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