Monday, April 15, 2024
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महाड़ सत्याग्रह के92वर्ष!

विनोद कोचर

बॉम्बे विधान परिषद(Bombay Lejisletiv Council)द्वारा पारित प्रस्ताव को, जिसके द्वारा यह घोषित किया गया था कि सार्वजानिक तालाबों और कुँओं से पानी खींचना जायज है, परखने के लिए डॉ. आंबेडकर अपने ‘अछूत’ अनुयायियों के साथ महाड़ के सार्वजानिक तालाब पर पानी लेने के लिए गए तो ‘अछूतों’ को सवर्ण हिंदुओं ने बड़ी निर्ममता से मारा।इस घटना की रिपोर्ट गांधीजी ने अपने साप्ताहिक पत्र में प्रकाशित की और डॉ आंबेडकर के कदम का पूरी तरह से समर्थन किया।अपने साप्ताहिक पत्र, ‘यंग इंडिया’के24-8-1927के अंक में गांधीजी ने लिखा कि:-
‘इस बात को कोई नहीं मान सकता कि स्थिर चित्त और अविवेक साथ साथ रह सकते हैं।खुद छुआछूत के पीछे ही कोई विवेक का आधार नहीं है।यह एक अमानवीय संस्था है।यह जब लड़खड़ा रही है तो कथित कट्टरपंथियों का दल निरे पाशवी बल से इसे सहारा दे रहा है।’
‘कथित अछूतों ने अत्यधिक उत्तेजनात्मक स्थिति में भी बेमिसाल आत्म संयम का परिचय देकर अछूत समस्या को सुलझाने की दिशा में और एक कदम आगे बढ़ा दिया है।अगर वे बदला ले लेते तो यह बताना बड़ा कठिन हो जाता कि दोष किसका और कितना है?लेकिन जो स्थिति है उसमें सारा का सारा दोष ‘स्पृश्यों’का ही है।पाशवी बल से छुआछूत कायम नहीं रहने वाला है।इससे तो पीड़ित वर्ग के पक्ष में ही लोगों के दिल बदलेंगे।यह घटना यह भी इतिहास अंकित करेगी कि कम से कम कुछ ‘स्पृश्यों’ ने असहाय अछूतों का बचाव करने की कोशिश की थी।भगवान करे महाड़ में ऐसे लोग और भी जादा हों।ऐसे मौकों पर मौन सहानुभूति कोई माने नहीं रखती।प्रत्येक हिन्दू को जो छुआछूत समाप्ति को सर्वोच्च महत्त्व देता हो, ऐसे मौकों पर अपना सिर फुड़वाने की जोखिम उठाकर भी ऐलानिया तौर पर असहायों और दलितों की रक्षा करनी चाहिए।
‘मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि कथित अछूतों को बॉम्बे विधान परिषद और महाड़ नगरपालिका के प्रस्तावों को परखने के लिए, तालाब पर जाकर अपनी प्यास बुझाने की सलाह देकर डॉ आंबेडकर ने बिलकुल ठीक किया था।इस तरह के सुधारों में रूचि रखने वाली हिन्दू महासभा जैसी संस्थाओं को इस घटना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।उन्हें मेरे संवाददाता के कथनों की जाँच करनी चाहिए और अगर ये कथन सही सिद्ध हो जाते हैं तो ‘स्पृश्यों’की करतूत की उन्हें भर्त्सना करनी चाहिए।हरेक बुराई का, और छुआछूत निश्चित ही एक बुराई है, खात्मा करने के लिए जाग्रत जनमत पैदा करने का और कोई उपाय नहीं है।’

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