‘सीक्रेट मीटिंग’ करके मांझी ने चला एक और दांव

पटना  बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भले इनकार करें लेकिन यह साफ हो चुका है कि उनके और मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बीच रिश्ते पहले जैसे नहीं हैं। राजनीतिक हलकों में तेजी से बदलते घटनाक्रम के बीच रविवार को जीतन राम राम मांझी अपने गोपनीय अजेंडे पर थे। उन्होंने छुट्टी के दिन प्रदेश के अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारियों के साथ बैठक करके दलितों-महादलितों के बीच साफ संदेश दे दिया है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने जीतन राम मांझी को हटाए जाने के कयास को एक बार फिर खारिज कर दिया। दिल्ली से लौटने पर रविवार को पटना एयरपोर्ट पर नीतीश ने कहा, ‘मुख्यमंत्री को हटाए जाने को लेकर कयासबाजी अनावश्यक है। न जाने क्यों और कहां से यह बात उड़ी है, मुझे नहीं मालूम। दिल्ली में इस विषय पर न चर्चा हुई और न ही इसकी आवश्यकता थी। मैंने दिल्ली जाते वक्त भी कहा था कि बिहार के मसले के लिए दिल्ली में विमर्श की जरूरत नहीं है।’ उन्होंने कहा, ‘विलय को लेकर दिल्ली में अच्छी और कई दौर की बैठक हुई है। प्रक्रिया को हम आगे बढ़ाने में लगे हैं। थोड़ा वक्त लगता है।’ नीतीश ने बताया कि 17 जनवरी से उनकी संपर्क रैली का कार्यक्रम फिलहाल स्थगित हो गया है।

मांझी की इस बैठक को लेकर एक बार फिर से बिहार के सियासी गलियारों में चर्चा का बाजार गर्म होने लगा है। अनुसूचित जाति-जनजाति संगठनों के अखिल भारतीय परिसंघ के बैनर तले हुई इस बैठक में मुख्यमंत्री ने बारी-बारी से अधिकारियों से यह जानने की कोशिश की कि विभाग में काम करने के दौरान उन्हें किस प्रकार की परेशानियों का सामना करना होता है। इस दौरान कई कर्मचारियों और पदाधिकारियों ने उन्हें अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक समस्याओं के बारे में भी जानकारी दी। बैठक के दौरान ही मुख्यमंत्री ने आरक्षण के मुद्दे पर भी अधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया।
महत्वपूर्ण यह है की मुख्यमंत्री की इस बैठक से मीडिया को पूरी तरह से दूर रखा गया था। बाद में खुद मुख्यमंत्री ने सिर्फ इतना कहा अधिकारियों के संग गोपनीय बैठक थी। बिहार की राजनीति के जानकारों का मानना है कि जीतन राम मांझी अब नीतीश कुमार की छाया बनने को कतई तैयार नहीं हैं। धीरे-धीरे ही सही मांझी अब खुलकर सियासी महात्‍वाकांक्षा जाहिर करने लगे हैं। उनकी चाल और कदम से यह साफ होने लगा है कि वह खुद को दलितों का मसीहा बनने के लिए हर जतन कर रहे हैं।  हाल में उन्होंने प्रशासनिक फेरबदल में नीतीश कुमार की पसंद के कई ऑफिसरों को महत्वपूर्ण पदों से हटा दिया और कई दलित-महादलित अधिकारियों को अहम पदों पर तैनात कर दिया। राजनीति के जानकारों का कहना है कि मांझी के इन कदमों से साफ होता है कि वह महादलित वोटरों की गोलबंदी कर रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले मांझी ने गया में कार्यक्रम में कहा भी था, ‘यदि 22% दलित एकजुट होकर मतदान करें तो किसी दलित को मुख्‍यमंत्री बनने से कोई नहीं रोक सकता। मैं साबित करना चाहता हूं कि महादलित भी किसी प्रदेश की सरकार सही तरीके से चला सकता है।’  सूत्रों के अनुसार, रविवार की गोपनीय बैठक में मुख्यमंत्री ने दलितों पर हो रहे अत्याचार और अमानवीय घटनाओं का जिक्र करते हुए ऑफिसरों को हिदायत दी कि उन्हें अपने लोगों के लिए काम करना चाहिए। बातों ही बातों में मुख्यमंत्री ने यह संदेश भी दिया कि उनके कार्यकाल में दलितों के लिए काफी काम किया जा रहा है और अब यह परंपरा जारी रहनी चाहिए। कोशिश होनी चाहिए कि प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री दलित हो, ताकि दलितों के शुरू किए गए विकास कार्य में भविष्य में कोई बाधा न आने पाए।

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