Sunday, June 23, 2024
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आज की दशा

विजय पाल यादव

हर इंसान निरन्तर अमन- चैन ,सुख – सम्रद्धि से जीना चाहता है। यह चाहना प्राकृतिक है, लेकिन मनुष्यों की यह चाहना अभी अधूरी है । अधूरापन मनुष्यों को स्वीकार नहीं होता ।इसी अस्वीकृति का नाम मजबूरी ,समस्या या दुख है ।आज बच्चे उपेक्षित एवं पढ़ाई के दबाव में हैं। युवा पीढ़ी को अपनी उपयोगिता -अपना महत्व साबित करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। बेरोजगारी की पीड़ा युवाओं में टूटन , कुण्ठा एवं हीन भावना पैदा कर रही है । फलत: वह निराशा , अकेलेपन, नशे एवं अपराध की अंधेरी गलियों में भटक रहे हैं। बुजुर्ग पीढ़ी भयंकर उपेक्षा का शिकार है प्रकृति की आंतरिक व्यवस्था भी टूट रही है। या तोड़ी जा रही है और धरती बीमार हो चुकी है। खेती एवं देसी कारीगरी उजड़ रही है। किसान, मजदूर एवं कारीगर कर्ज व बीमारियों के दलदल में फंस चुका है। दुनिया की बड़ी आबादी 3 चौथाई से भी ज्यादा भयंकर अभाव में जी रही है। अब खुदरा व्यापार भी कार्पोरेट घरानों के हवाले किया जा रहा है। न्याय व सुरक्षा के मोर्चे पर सरकारें बुरी तरह से असफल हो चुकी हैं।

सरकारों का अपना कोई अस्तित्व हो ऐसा दिखाई नहीं देता है। कार्पोरेट सेक्टर का दुनिया पर कब्जा बढ़ता जा रहा है। इन हालातों से मुक्ति पाने के लिए अनेकों प्रयास भी चल रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पा रही है। हमें लगता है यह सभी समस्याएं आदमी के द्वारा पैदा की गई हैं। आदमी जानबूझकर कोई समस्या पैदा नहीं करता आदमी से यह समस्याएं अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने या सुखी होने के क्रम में समझ की कमी के कारण पैदा हुई हैं। आवश्यकता अथवा सुख की ठीक-ठीक समझ ने होने के कारण यह संकट पैदा हुआ है। हमें लगता है यदि समस्या का स्रोत आदमी है तो समाधान का स्रोत भी आदमी ही होगा। जिस रास्ते पर दुनिया चल रही है, उस पर चलकर कोई सफलता नहीं हो सकता।

आज की सफलता में भी गहरी असफलताएं छुपी हैं। आज का हर पढा लिखा व्यक्ति असफल होता दिख रहा है। आज हम ऐसे रास्ते पर चल पड़े हैं जो मनुष्य विरोधी, परिवार विरोधी, समाज विरोधी एवं प्रकृति विरोधी है एक दूसरे को गिरा कर हम आगे बढ़ना चाहते हैं जो प्रकृति में व्यवस्था नहीं है और गिर ना कोई चाहता नहीं है प्रकृति को लूट कर उसकी व्यवस्था को भंग करके समृद्ध होना चाह रहे हैं जिससे भयंकर गरीबी पैदा हो रही है।

 

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