बाहर तो गैर हैं, अपनों से महफूज नहीं हम!

लतिका जोशी 

ऐसा नहीं है कि मैं अपने भाई के घर आज पहली बार गई थी और इसलिए उनकी बेटी नेहा चुपचाप सी बैठी थी। उन्होंने किराये का घर अभी कुछ दिनों पहले ही बदला है। मुझे पता चला कि घर बदलने का कारण उनके पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति हैं जिन्हें नेहा ‘भैया‘ कहा करती थी। एक दिन नेहा डरी-सहमी सी घर आई, पता चला कि वह ‘भैया‘ उसे छूते हैं। शायद उसे स्कूल में ‘बैड टच‘ का मतलब बताया गया होगा।
आज जब मैंने 10 साल की इस बच्ची की आंखों में एक अजीब सा, लेकिन जाना-पहचाना डर देखा तो ऐसा लगा जैसे शरीर के साथ मेरी रूह भी जम गई है। ऐसा लगा कि मेरे सामने मेरी बचपन की सहेली (नाम नहीं ले सकती) आकर खड़ी हो गई है। वह पता नहीं कहां होगी अब, कैसी होगी। पर, अब तक वह दिन मेरे जेहन से दूर नहीं होता जब उसने मुझे बताया कि उसके रिश्ते के चाचा उसके साथ बुरी हरकतें करते हैं। उसने उस दिन बताया था और बहुत रोते हुए बताया था कि जब घर पर कोई नहीं होता, तो वह उसे गोद में बैठने को कहते हैं। उसे छूते हैं। उसे अपने करीब ले आते हैं, बहुत करीब। उसके मम्मी-पापा दोनों नौकरी करते थे। वह कोई रिश्ते के चाचा थे जो नौकरी की खोज में थे और उनके घर पर ही रहते थे।
जब उसने मुझे बताया, मैं यह मानने के लिए तैयार ही नहीं हुई, क्योंकि यह बात मेरे लिए असंभव सी थी कि कोई चाचा आपनी भतीजी के साथ ऐसी हरकत भी कर सकता है। शायद ऐसा इसलिए था क्योंकि मुझे कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ था और शायद इसकी वजह यह भी थी कि तब हम आठवीं में पढ़ते थे। उस उम्र में ‘बड़ों के लाड़‘ और ‘बुरी हरकत‘ में अंतर करने की समझ ही नहीं थी और किसी दूसरे के लिए यह अनुभव करना तो और भी कठिन था। मेरी यह प्रतिक्रिया देखने के बाद उसने ये बात फिर कभी नहीं की।
पर, एक दिन जब हम साथ में स्कूल जा रहे थे, मुझे लगा कि वह उदास है। मैंने उससे वजह पूछी तो वह फूट-फूट कर रो पड़ी। तब हम 10वीं में पढ़ते थे। उसने रोते-रोते कहा कि उसके चाचा उसे अब और भी परेशान करने लगे हैं। आंसुओं में भीगा उसका चेहरा आज भी नहीं भुला पाई हूं मैं। मैंने उससे पूछा कि उसने आंटी को यह सब क्यों नहीं बताया तो उसने कहा कि उसने पिछले दो सालों में बहुत कोशिश की है पर उसकी मां उसकी बातों पर भरोसा नहीं करतीं। उन्हें लगता है कि उनकी बेटी पढ़ाई से जी चुरा रही है इसलिए तमाम बहाने बना रही है। उसके चाचा को भी जब यह समझ आने लगा कि अब वह सब समझने लगी है और उनके सामने आने से कतराने लगी है। तो उस आदमी ने एक नई चाल चली। उसने आंटी से मेरी दोस्त के बारे में कहा कि वह मैथ्स में बहुत कमजोर है और वह उसे स्कूल के बाद मैथ्स पढ़ाएगा। पहले तो वह अपनी मां के घर आने तक घर से दूर रहने का कोई न कोई बहाना बना लेती थी पर अब इसका भी कोई रास्ता न देख वह बहुत परेशान रहने लगी थी।
मैं सोचती थी कि कैसे एक मां के पास अपनी बेटी की आंखों में डर देखने का समय नहीं है। कैसे कोई पिता अपने काम में इतना व्यस्त है कि अपनी फूल सी गुड़िया को मुरझाते हुए नहीं देख पा रहा। हद तो तब हो गई जब एक दिन उसने मुझे अपने सीने पर सिग्रेट के निशान दिखाए। उसके सीने पर नशे में उस दरिंदे ने जलती हुई सिग्रेट के इतने भयंकर निशान लगाए थे कि देखकर मेरी चीख निकल पड़ी। वह बहुत घबराई हुई थी और किसी भी कीमत पर घर नहीं जाना चाहती थी। हमने बहुत हिम्मत करके यह बात मेरी ममी को बताई। उसके बाद मैं और मेरी दोस्त, ममी के साथ उनके घर पर गए और उसकी ममी को सब कुछ बताया। आप जानकर हैरान होंगे उसकी मां ने हमारे सामने उसे कसकर एक थप्पड़ मारा और पूछा कि कहीं यह बात हमारे अलावा उसने किसी और को तो नहीं बताई? 10वीं के एग्जाम के बाद उसे शहर से बाहर पढ़ने भेज दिया गया। उसके बाद वह कभी घर नहीं आई।
इस बात को करीब 10 साल बीत चुके हैं। समय बदला है। अब लोग अपने बच्चों के बारे में ‘लोग क्या कहेंगे‘ वाली सोच से बढ़कर सोचते हैं। पर, क्या यही इस समस्या का समाधान होना चाहिए था जो हुआ? क्या मेरी दोस्त को घर से बाहर उसके ‘चाचा‘ जैसे अन्य लोग कभी नहीं मिले होंगे? क्या उसके घर वालों ने धक्के मारकर उस ‘चाचा‘ को बाहर नहीं निकाल फेंकना चाहिए था? क्या उसे पुलिस के हवाले नहीं किया जाना चाहिए था? क्या मेरे भाई की बेटी को अब कोई ऐसा ‘भैया‘ दोबारा नहीं मिलेगा? क्या हमारे समाज में ऐसे चाचा, मामा, भैया, जीजा या अंकल की कमी है? क्या हमें अपने परिवार का माहौल ऐसा नहीं बनाना चाहिए कि बच्चे खुलकर अपनी मां से अपने दिल की बात कर सकें? हमारा समाज बस लड़कियों को पर्दे के पीछे रखना जानता है। बाहर वालों के डर से उन्हें घर के अंदर कैद कर दिया जाता है और घर के अंदर अगर आबरू पर बात बन आए तो उसे दूर भेज दिया जाता है। हां, दोनों मामलों में इस बात का ध्यान जरूर रखा जाता है कि किसी को कानों-कान खबर न हो।
भारत में आज हर तीसरे घर में लड़कियों का शोषण हो रहा है और भाग्य की विडंबना यह है कि लड़कियां अपने ही माता-पिता को अपने साथ होने वाली इस घिनौनी हरकत के बारे में नहीं बता पातीं। लाइफ में आगे बढ़ना और काम में व्यस्त होना अच्छी बात है पर ध्यान रहे कि समाज से बढ़कर आपका परिवार है और उससे भी बढ़कर उन नन्ही कलियों का जीवन है जो आपके ही घर में इन ‘मामाओं‘, ‘चाचाओं‘, ‘भैयाओं‘ और ‘जीजाओं‘ के पैरों तले चुपचाप रौंदा जा रहा है।

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