Sengol Controversy : कौन किसको सत्ता सौंप रहा है ? 

कहीं नई संसद में प्रवेश को ही असली आज़ादी तो नहीं मान रहे हैं मोदी  इस परम्परा को निभाने के लिए तो करना पड़ेगा कम से कम एक साल का इन्तजार, नहीं तो मोदी किसी और को पीएम बनाकर निभाएं परम्परा को

चरण सिंह राजपूत 
सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक सेंगोल पर इतना विवाद क्यों ? क्यों इस मामले को इतना तूल दिया जा रहा है ? किसकी सत्ता का हस्तांतरण हो रहा है ? बीजेपी की सरकार है और नई संसद के उद्घाटन के भी बीजेपी की ही सत्ता रहेगी।

हां यदि बीजेपी पीएम किसी और को बना दे तो एक तरह से व्यक्तिगत सत्ता हस्तांतरण कहा जा सकता है। जिस शब्द का इस मौके पर मतलब ही नहीं है उस पर इतना विवाद का क्या मतलब ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि मोदी नए संसद भवन में घुसने के बाद ही देश को आज़ाद मानेंगे ? वैसे भी उनके कई समर्थक कह चुके हैं कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद ही देश को असली आज़ादी मिली है। बीजेपी की तो आदत बन चुकी है कि किसी भी बात पर कांग्रेस विशेषकर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को दोषी ठहरा दें। किसी भी कुतर्क को तर्क बनाकर देश पर लाद दे। बीजेपी ने एक तो एक संसद रहते हुए नई संसद बनाई। तर्क दे रहे हैं कि यह संसद अंग्रेजों ने बनाई थी। अपनी संसद में बैठेंगे। दूसरी ओर उस परम्परा को अपना रहे हैं जो अंग्रेजों ने शुरू की।

माउंटबेटन कौन था ? वैसे तो हर राजतंत्र का प्रतीक लोकतंत्र को चिढ़ाता है। जमीनी हकीकत तो यह है कि मोदी को राजतंत्र से जुड़ी चीजें अच्छी लगती है। पीएम बने हैं लोकतंत्र की वजह से खोये रहते हैं राजतन्त्र में। राष्ट्रपति से उद्घाटन करा देते तो बीजेपी का मान ही बढ़ता। आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनाकर तो जमकर वाहवाही लूटी थी। अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से संसद का उद्घाटन कराकर भी वाहवाही लूट लेते। पर यह कैसे हो सकता है कि साहिब हों पर कोई दूसरा व्यक्ति संसद उद्घाटन कर दे। विश्वगुरु जो ठहरे। जहां तक सेंगोल की परम्परा की बात है तो बीजेपी ही बताये कि संसद भवन में कैसा सत्ता हस्तांतरण ? हालांकि कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने इस तरह के कोई दस्तावेज न होने की बात कही है। एक बार को मान लिया जाये कि माउंटबेटन ने पंडित नेहरू को इसे सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के रूप में दिया था। तो बीजेपी यह भी बताए कि मोदी को सेंगोल कौन देगा ? सत्ता का हस्तांतरण कहां हो रहा है ?

इस परम्परा को निभाने के लिए तो कम से कम एक साल का इंतजार करना पड़ेगा। सत्ता परिवर्तन पर इस सेंगोल की परम्परा को तूल देते तो समझ में आता ? अब जब किसी प्रकार की सत्ता हस्तांतरण हुआ ही नहीं तो फिर इसका क्या महत्व  और क्या विवाद ? या फिर पीएम मोदी किसी और को पीएम बनाकर यह सेंगोल उसे सौंपें तो किस हद तक इस परम्परा का निर्वहन किया जा सकता है।
दरअसल अब नए संसद भवन के उद्घाटन से भी ज्यादा चर्चा सेंगोल की हो रही है। इस सेंगोल को सत्ता के हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर पेश किया जा रहा है। भाजपा का आरोप है कि आजादी के समय पंडित नेहरू को यह सेंगोल सौंपा गया था लेकिन उसके बाद हिंदू परंपरा के प्रतीक इस सेंगोल को म्यूजियम में रख दिया गया। जिसे अब पीएम मोदी को सौंपा जाएगा। हालांकि बीजेपी ने यह नहीं बताया कि उस समय तो अंग्रेजों ने भारतीयों को सत्ता सौंपी थी अब कौन किसको सत्ता सौंप रहा है।

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