Monday, April 15, 2024
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अपराधी अब छूटते!

झूठों के दरबार में, सच बैठा है मौन !
घेरे घोर उदासियाँ, सुनता उसकी कौन !!

कुछ सिक्कों के तोल में, बिकने लगी जुबान !
वकील,गवाह,जज बिके, कचहरी ज्यों दुकान!!

ज़ीरों ले बाबू हुए, काटे मेरिट घास !
डिग्री पैसों में बिके, ज्ञान हुआ बकवास !!

आँखें-गुर्दे सब बिके, लगे भाव भरपूर !
परचूनी दूकान हुआ, बेचारा मजदूर !!

कैसी ये सरकार है, कैसा है कानून !
करता नित ही झूठ है, सच्चाई का खून !!

बदले सुर में गा रहे, अब शादी के ढोल !
दूल्हा कितने में बिका, पूछ रहे हैं मोल !!

अपराधी अब छूटते, तोड़े सभी विधान !
निर्दोषी हैं जेल में, शर्मिन्दा संविधान !!

डॉ. सत्यवान सौरभ

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