मनमोहन सिंह और इतिहास , जिक्र ईमानदार प्रधानमंत्री का ज्यादा होगा या उनके भ्र्ष्टा कार्यकाल का

-दिनेश कुमार शर्मा 

कोयले की कालिक में अब देश के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह भी पूरी तरह रंग चुके है। हिंडाल्को को कोयला ब्लाक आवंटन के मामले में गडबडी करने के तहत सी.बी.आई. की विशेष अदालत नें मनमोहन सिंह जी को समन जारी किया है। डॉ मनमोहन सिहं की छवि एक योग्य अर्थशास्त्री व ईमानदारी के साथ काम करने वाले एक चिंतक की रही है। जिन्होंने नरसिंघा राव के समय में सफलता पूर्वक वित्त मंत्री के पद पर रहते हुए देश को नई दिशा दी थी । लेकिन डॉ मनमोहन सिंह के काल में जम कर घोटाले हुए कुछ लोग इसे घोटालों का काल भी कहते हैं। ऐसी क्या मजबूरी थी ? की एक ईमानदार प्रधानमंत्री नें इसके लिए कभी एक शब्द नहीं कहा, घोटाले करने वालों पर अंकुश क्यों नहीं लगाया गया? वह कौन सी मजबूरी थी जिसने उन्हें मौन रहने पर विवश किया? एक प्रेस कांफ्रेंस में डॉ मनमोहन सिंह ने कहा था ‘ इतिहास उदारता पूर्वक मेरा मूल्यांकन करेगा |’ लेकिन आज हालात कुछ औऱ है। 2004 में कांग्रेस के पास पूर्ण बहुमत नहीं था लेकिन 16 दलों के समर्थन से सरकार बनी | सोनिया जी यूपीए की चेयर पर्सन थी| विदेशी मूल का होने के कारण उनके व प्रधान मंत्री पद के बीच कई बाधाएँ थी | सोनिया जी अपनी दो संतानों में पहले पुत्र राहुल गाँधी को भविष्य में प्रधानमंत्री पद पर आसीन देखना चाहती थी। जो उस समय अनुभवहीन थे और जनता को यह स्वीकार्य नहीं होता । उनकी नजर में डॉ मनमोहन सिंह सबसे उपयुक्त थे क्योकि वह सिख थे औऱ 1984 में हुए दंगो का दाग भी कांग्रेस को धोना था | डॉ मनमोहन सिंह किसी के लिए परेशानी का कारण नहीं बन सकते थे उनके घर के बाहर नियुक्त कांस्टेबल के लिए भी आराम ही आराम था | वह काफी समय तक सरकारी नौकर रहे हैं तो उनमें एक आज्ञाकारी नौकरशाह के गुण भी भरपूर थे | मनमोहन सिहं जी बिलकुल रामायण के चरित्र “भरत “जैसे थे नेहरू जी के वंशजों का सिहासन बिल्कुल सुरक्षित रहता | वह राज्य सभा के सदस्य थे ,तथा कांग्रेस की और से विपक्ष के लीडर भी रहें हैं | उनकी तीन पुत्रिया हैं लेकिन आज इस भाई-भतीजेवाद के दौर में उन्होने कभी अपनी बेटियों के लिए टिकट या पार्टी में जगह की माँग नहीं की । सोनिया जी के प्रधानमंत्री पद के लिए इनकार करने के बाद कांग्रेस में शानदार राजनैतिक ड्रामा शुरू हो गया । हर कांग्रेसी नेता उनसे पद सम्भालने की प्रार्थना कर रहा था बाहर चाटूकारो की भीड़ थी | अफ्फाहों का बाजार भी गर्म था अंत में सोनिया गाँधी का मौन टूटा उन्होंने मनमोहन सिहं का नाम प्रस्तुत किया और सौलह दलों के समर्थन के साथ उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया | 22 मई 2004 को डॉ मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ग्रहण की | सोनिया जी के त्याग के चर्चे किये जाने लगे उनका कद पहले ही बहुत बड़ा था जो अब आसमान को छूने लगा था | पर अब देश में दो सत्तायें राज कर रही थी एक यूपीए अध्यक्ष की ,दूसरी मनमोहन सिह की सरकार कि सत्ता | जब भी प्रधानमंत्री अपने आफिस आते थे उनके हाथ में आवश्यक फाइल होती थी पीछे उनका ड्राइवर उनका खाना लेकर आता था वहां कोई हलचल नहीं होती थी पर जब सोनिया जी आती तो नेता गण ऐसे भागते थे जैसे रोटी को देख कोई भूखा व्यक्ति भागता है नमस्ते करने की जैसे एस होङ लग जाती थी | इतनी जी हजूरी की बस पूछिये मत | मैडम को अपनी भक्ति दिखाना जैसे जीवन का सबसे बड़ा धर्म है । इससे समझ आ जाता है कि कौन सत्ता का केंद्र था | तो फिर आज सारा दोष मनमोहन जी पर ही क्यों ? मनमोहन सिंह जी ने अपने समय में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए उनकी नीति आर्थिक उदारीकरण थी । आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने में दुनियाभर में उनकी सराहना की गई | उन्होंने किसानों के हित में कृषि का समर्थित मूल्य बढ़ाया , गाँधी जी का सपना था सबको रोजगार मिले डॉ मनमोहन सिंह के प्रयत्नों से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू की गई | जिसमें वर्ष भर में 100 दिन का रोजगार प्रदान करने का सुझाव था उनकी योजना होते हुए भी कांग्रेस जनों ने राहुल जी के द्वारा सुझाई योजना सिद्ध करने में कोई कोई कसर नहीं छोड़ी । हवाई अड्डों को निजी हाथों मे सौपा गया जिससे उनका सौंदर्यीकरण हुआ, सुविधायें बढ़ी और विदेशी टूरिस्ट भारत की और आकर्षित हुए |अर्थव्यवस्था पर बोझ बने कई पब्लिक सेक्टरों को निजी हाथों में सौपा जिससे उनका घाटा कम हुआ | नौजवानों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने का प्रयत्न किया यहाँ तक की आर्थिक मंदी के दौर में भी विदेशी निवेश कम नहीं हुआ । ऊर्जा के क्षेत्र में उन्होंने परमाणु समझौता किया जबकि विपक्ष और यूपीए को समर्थन देने वाले वामपंथी दल इस समझौते के खिलाफ थे । इस समझौते के अनुसार अमेरिका भारतीय परमाणु संयंत्रों पर निगरानी रखने के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी को यह कार्य सौंपना चाहता था | अमेरिकन सीनेट में यह समझौता पास हो गया ,वामपंथी दल समझौते के खिलाफ थे उन्होंने सरकार से समर्थन खीचने की धमकी दी | सोनिया जी बामपंथी दलों की धमकी से परेशान थी वह सरकार का गिरना बर्दाश नहीं कर सकती थी | डॉ मनमोहन सिहं अड़ गये उन्होंने इस्तीफे की धमकी तक दे डाली ,अंत में मध्यम मार्ग निकाला गया | तय यह हुआ कि भारत में 22 संयंत्रों में से केवल 14 की निगरानी होगी 8 सैनिक महत्व के संयंत्रों की निगरानी नहीं होगी | वामपंथी दलों ने समर्थन खीच लिया परन्तु मुलायम सिंह से समर्थन माँग कर सरकार बचाई गई | अपनें में मनमोहन सिंह इतने कमजोर नहीं थे और यह समझौता संसद में पास हो गया | 2014 के चुनावों के आने तक खाद्य सुरक्षा बिल पास हुआ जिसके लिए सोनिया गाँधी ने राहुल जी कि पीठ थपथपाई | सभी जानते हैं जब कोई ठोस निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय से लिया जाता और उसपर हो हल्ला मचता तो सोनिया जी उस निर्णय को वापिस ले लेतीं | डॉ मनमोहन जी के पूरे कार्यकाल में हर मंत्री अपने आप को सोनिया जी के प्रति उत्तरदायी और वफादार सिद्ध करने में गौरव महसूस करता | चुनाव का समय था कांग्रेस चुनाव प्रचार में लगी हूई थी तभी प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारू ने अपनी पुस्तक ‘ द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ पुस्तक का विमोचन किया पुस्तक में संजय बारू ने दावा किया मनमोहन सिहं ने उनके सामने स्वीकार किया था कि ‘सत्ता का केंद्र कांग्रेस अध्यक्ष के पास था उनसे गलतियाँ तब हुई जब सोनिया गाँधी और कांग्रेस ने उनके फैसले में हस्तक्षेप करना शुरू किया | 2009 की जीत को वह अपने कार्यों की जीत मानते थे उन्होंने माना कि वह कोई भी नियुक्ति स्वतंत्र रूप नहीं कर सकते थे। जैसे वह श्री रंगराजन को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे परन्तु सोनिया गाँधी की पसंद प्रणव मुखर्जी थे | आगे श्री बारू ने लिखा है 2009 के चुनाव के बाद प्रधानमंत्री ए.राजा और टी .आर .बालू को मंत्री मंडल में शामिल नहीं करना चाहते थे परन्तु पार्टी के दबाब में उन्हें ऐसा करना पड़ा ‘|प्रधान मंत्री के आफिस की फाइल सोनिया जी के पास जाती थीं जबकि यह पद की गोपनीयता की शपथ के खिलाफ था | विरोधियों में खास कर भाजपा नें पुस्तक पर कहा वह पहले ही कहते थे मनमोहन सिहं नाम मात्र के प्रधानमंत्री हैं। सत्ता सोनिया जी के पास है इस पुस्तक से प्रधानमंत्री की छवि अवश्य खराब हूई । घोटालों से कांग्रेस पहले ही बदनाम थी जनता कांग्रेस से विमुख हो रही थी। चुनाव में विपक्ष के हाथ में शानदार मुद्दा आ गया। चौतरफा हमला होने लगा उनके प्रश्नों का उत्तर देना मुश्किल होने लगा था और अंत में जो परिणाम आए हम सभी उससे वाकिफ है। डॉ मनमोहन सिंह का समय सत्ता के दो केन्द्रों का काल , भ्रष्टाचार, घोटालों ,महंगाई प्रधानमंत्री का निर्णय न लेना या निर्णय लेने में देरी आदि के लिए जाना जा जाता है ,परन्तु उनकी ईमानदारी पर किसी को शक नहीं है | चाहें आज परिस्तिथियाँ कोई भी हो लेकिन इतिहास में उन्हें एक अर्थशास्त्री ,चिंतक और ईमानदार डॉ मनमोहन सिंह के रूप में भी जाना जायेगा उनके विद्यार्थी एक विद्वान् गुरू के रूप में उन्हें याद रखेंगे तथा विश्व के शिक्षा व राजनैतिक जगत में उनका नाम सदा सम्मान से लिया जायेगा ।

—लेखक इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चॅनेल से जुड़े एक उदयीमान पत्रकार है 

 

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