कभी सुना है, गरीबी पर संसद में एक घंटा चर्चा हुई हो?

नई दिल्ली।  क्या कभी आपने किसी राजनेता को गरीबी की हालत में देखा है? संभव ही नहीं है। क्योंकि राजनेता गरीब होते ही नहीं। उन्हें भीड़ में मंदिर के दर्शन करने नहीं जाना पड़ता। उन्हें रेल का टिकट लेने के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता। उन्हें अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिल दिलाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ता। उन सबकी जाति का नाम होता है, वीआईपी। वीआईपी होने के बाद वे यादव, गुप्ता, ठाकुर, अ.जा./अ.जन.जाति या ब्राह्मण वर्ग के होते हैं। कभी किसी लाठीचार्ज या मंदिर दर्शन के लिए उमड़ी भीड़ में कुचले जाने वालों में आपने किसी राजनेता का नाम सना है? जो लोग कुंभ में भगदड़ में मरते हैं या देश के किसी भी कोने में किसी भी सरकार के अंतर्गत किसी मंदिर में दर्शन के लिए जा रहे लोग होते हैं जो अचानक कुचले जाते हैं, वे भारतीय ही होते हैं और यह कहना गलत होगा कि स्थानीय शासन-प्रशासन को इस बात का अहसास नहीं होता कि शिवरात्रि, दुर्गापूजा, रामनवमी या ऐसे किसी हिंदू पर्व पर बेचारे गरीब साधारण बिना वीआईपी गेट के घुसने वाले भगदड़ का शिकार हो सकते हैं।

वास्तव में हमारा पूरा संसदीय लोकतंत्र संसद के भीतर और बाहर केवल अमीरों की देखभाल और अमीरों के विषय पर चर्चा के लिए समर्पित रहता है। क्या कभी किसी ने सुना है कि देश में गरीबी पर किसी भी सदन में एक घंटा चर्चा हुई हो? क्या कभी सुना है कि जिस देश में दुनिया भर में सबसे ज्यादा कुपोषण के शिकार लोग रहते हों, उस देश की संसद में कुपोषण से मरने वाले बच्चों या कुपोषण के कारण जिंदगी भर अपाहिज हो जाने वाले लोगों के दुःख-दर्द और उसका सामना करने के तरीकों पर कार्य स्थगन का नोटिस दिया हो और उस पर चर्चा हुई हो? क्या किसी विधानसभा, खास तौर पर ऐसी विधानसभा जिसमें जिस कोने में देखो उस कोने में सब आप ही आप दिखते हों उसमें बेघर लोगों, फुटपाथ पर सोने वालों, सरकारी रैनबसेरों में कीड़े-मकौड़ों की तरह ठूंस-ठूंस कर जीने वालों के बारे में बहस हुई हो और उसके नतीजों पर कोई भी सरकार हो, उसने सार्थक घोषणा की हो? कभी दलितों पर होने वाले अत्याचारों के संदर्भ में सदन में हंगामा हुआ या इस ओर या उस ओर वालों में से किसी ने भी यह कहते हुए कि दलितों पर अत्याचार अब हम सहन नहीं करेंगे, इसलिए इस मुद्दे पर आज ही अभी चर्चा की जाए, सदन न चलने दिया हो? कभी गंदगी और कूड़े कर्कट के जहरीले पानी में उगायी जाने वाली सब्जियों के बाजार में बिकने और उसके कारण होने वाले भयानक रोगों से जनता को बचाने के लिए सदन की गांधी मूर्ति पर किसी ने सत्याग्रह और प्रदर्शन किया?

इन सबसे अमीरों का कोई संबंध नहीं होता। ये अमीर राजनेता उस वर्ग से नहीं होते जो दिल्ली के दरियागंज या सब्जी मंडी तक जाकर फिर वहां भी सब्जियों का मोलभाव करते हुए सब्जी खरीदते हों। उन्हें इस बात का भी कभी दर्द हो भी नहीं सकता कि उस निम्न मध्यम वर्ग में पैदा होने वाले का अर्थ क्या होता है जहां बच्चों को दूध, फल व पौष्टिक आहार दिया जाना असंभव होता है। यह वह वर्ग भारत के विभिन्न प्रांतों में शासन कर रहा है जो गरीबी से दुःख से वाकिफ नहीं है बल्कि जिसके लिए भूख से ज्यादा थाली में लेना और फिर आधा-पौना खाना झूठा छोड़ देना स्वाभाविक बात है।

लेकिन इनके मन में गरीबों के लिए बहुत दर्द होता है। इनकी सारी जिंदगी ही गरीबों पर टिकी होती है। गरीब न हों तो इनके बंगले न बनें, गरीब न हों तो इनके पांच सितारा होटल के बिल न पास हों, गरीबों की भुखमरी, बदहाली, पिछड़ेपन को दूर करने के लिए इन लोगों को अमीर होना पड़ता है। ये लोग दिन भर सड़क पर पत्थर कूटते हैं, खेत खलिहान में काम करते हैं, मजदूरी के लिए छत्तीसगढ़, झारखंड, उड़ीसा का आदमी लद्दाख, श्रीनगर, पंजाब और हिमाचल जाता है। आधा पेट भर कर पैसा बचाता है। साल-दो साल में एक बार घर जाएगा तो बीवी-बच्चों के लिए अपना जमा पैसा खर्च करेगा। यही वो भारतीय है जो मंदिर की भीड़ में मारा जाता है। यही वह भारतीय है जो कुंभ में भीड़ बनता और श्रद्धा एवं आस्था की डोर से खींच कर ट्रेन में आरक्षण है या नहीं इसकी परवाह किए बिना यात्रा करता है। उसे उन सेक्यूलरों के तानों और पढ़े-लिखे लेकिन असभ्य फोटोग्राफरों से भी परेशानी नहीं होती जो हिंदू मेलों में सिर्फ तमाशे और फोटोग्राफी के लिए आते हैं। वह अपना धर्म निभाता है और वापस घर परिवार की ओर लौट जाता है। उसे इस बात की चिंता नहीं होती है कि संसद में शोर मच रहा है या न मच रहा है या काम हो रहा है। जब काम होता है तब कौन सा इन गरीबों के लिए वहां चर्चा होती है।

हर बहस और झगड़े अमीर राजनीतिक खानदानों की पसंद-नापसंद के अहंकार और आहत मन में बंटे रहते हैं। यह संसद कभी इस बात के लिए शोर-शराबे में नहीं डूबती कि गांवों में बेहतर स्कूल क्यों नहीं खोले जा रहे हैं और ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया जाता जिसमें यह अनिवार्य कर दिया जाए कि किसी शहर में कोई व्यक्ति फुटपाथ पर या भूखा पेट नहीं सोएगा। यह संसद इस बात के लिए शोर का अनुभव नहीं करती कि दफ्तरों में फैले हुए भ्रष्टाचार और कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे इंजिनियरिंग, मेडिकल तथा टैक्निकल कॉलेजों में पढ़ाने वाले अध्यापकों की बेहद कमी है और जो छात्र वहां से डिग्रियां लेकर आ रहे हैं वे न तो किसी शोध के लायक हैं न ही अपने डिग्री के अनुरूप किसी रोजगार के लायक हैं। इस पर कभी चर्चा सुनी है आपने या गुस्से में सदन के नियमों को तोड़ते हुए सांसदों को अध्यक्ष के निकट वेल में प्रदर्शन करते हुए देखा है?

ये धनी राजनेता गरीब जनता के लिए बहुत चिंतित हैं। इनको लेकर अकबर इलाहाबादी ने जो लिखा था, वह आज भी सत्य है-

रंज लीडर को बहुत है, मगर आराम के साथ
कौम के गम में डिनर खाते हैं, हुक्काम के साथ।

 

Comments are closed.

|

Keyword Related


link slot gacor thailand buku mimpi Toto Bagus Thailand live draw sgp situs toto buku mimpi http://web.ecologia.unam.mx/calendario/btr.php/ togel macau pub togel http://bit.ly/3m4e0MT Situs Judi Togel Terpercaya dan Terbesar Deposit Via Dana live draw taiwan situs togel terpercaya Situs Togel Terpercaya Situs Togel Terpercaya syair hk Situs Togel Terpercaya Situs Togel Terpercaya Slot server luar slot server luar2 slot server luar3 slot depo 5k togel online terpercaya bandar togel tepercaya Situs Toto buku mimpi Daftar Bandar Togel Terpercaya 2023 Terbaru