मध्यप्रदेश में शिक्षकों की मार से गायब हो रही है मासूमियत

सदियों से यही सुनते आ रहे हैं कि बच्चे भगवान का रूप होते हैं और गुरु साक्षात भगवान, जो प्रत्येक बच्चे का जीवन बनाते हैं, लेकिन मध्यप्रदेश में इस बात के इतर कुछ और ही नजारा है। यहां शिक्षक भगवान तो नहीं नजर आते, पर अपनी खीज को उतारने के लिए उन्हें सबसे सरल माध्यम मासूम बच्चे दिखाई देते हैं, जिसके चलते वे अपना गुस्सा इन मासूमों पर पिटाई लगाकर उतार रहे हैं। ऐसा नहीं है कि यहां समय-समय पर अधिकारियों द्वारा स्कूलों का निरीक्षण नहीं किया गया। बावजूद इसके शिक्षकों के गुस्से से मासूमों को इस पूरे साल में कोई नहीं बच पाया है। पिटाई भी कुछ इस तरह की गई कि कई बार तो बच्चों की जान पर बन आई। पिछले दो वर्षों में मारपीट के शिकार बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मारपीट की घटनाएं सरकारी और निजी दोनों ही स्कूलों में लगातार हो रही है।
राज्य के विद्यालयों के हाल जानने के लिए जब शिक्षा के अधिकार को लेकर काम करने वाले संगठन मप्र लोक संघर्ष साझा मंच ने जब यहां सर्वेक्षण किया तो यह बात उभरकर सामने आई है। इस संगठन ने 10 जिलों के 121 स्कूलों का सर्वे करते हुए स्कूलों में मारपीट के मामलों की जानकारी हासिल की है। सर्वे में यह तथ्य उभरकर सामने आया कि बच्चों को छोटी छोटी सी गलतियों पर शिक्षक बड़ी सजा दे रहे हैं। बच्चों के बाल पकडक़र उन्हें गिराया जा रहा है, डंडे से पीटा जा रहा है, कई बार इतनी अधिक मारपीट की जाती है कि शिक्षकों के गुस्से के कारण स्कूल पढ़ने गये बच्चों को कई बार अस्पताल में उपचार के लिए भेजने की स्थिति बनी है।
मप्र लोक संघर्ष साझा मंच द्वारा किये गये सर्वेक्षण में तथ्यों के आधार पर यह बताया गया कि स्कूलों में पिटने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। पिछले वर्ष बच्चों से मारपीट की घटनाओं का प्रतिशत 34 था, जो कि अभी ओर बढ़ गया है।
सरकार को करना होगा
शिक्षक अपने तनाव, गुस्से को बच्चों पर न निकालने के लिए प्रभावी प्रयास के साथ ही शिक्षकों के व्यवहार पर सतत निगरानी सरकार द्वारा रखे जाने की भी जरूरत है। शिक्षक का नाम सुनकर, स्कूल का नाम सुनकर, पढ़ाई की बात सुनकर बच्चों के मन में खुशी और उत्साह की भावना बढ़े, ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है। यदि प्रदेश की सरकार ऐसा नहीं कर पाई तो वह दिन दूर नहीं जब सरकारी स्कूलों में नियमित विद्यार्थियों की संख्या घटकर 30 प्रतिशत पर आ जाए, क्योंकि अभी सूबे के अधिकांश शासकीय स्कूलों में प्रतिदिवस वास्तविक उपस्थिति 40 से 55 प्रतिशत तक ही रहती है।
उल्लेखनीय है कि स्कूलों में बच्चों को भयमुक्त माहौल में शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार ने अनेक नियम कानून बनाए हैं। ये नियम कानून शिक्षकों को बच्चों के साथ मारपीट करने से रोकने के लिए है। बच्चों को शारीरिक दण्ड देना अब अपराध की श्रेणी में आता है। शिक्षकों को स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिये गये है कि बच्चों के साथ किसी भी प्रकार की मारपीट नहीं की जाये। केन्द्र शासन द्वारा लागू किया गया शिक्षा का अधिकार अधिनियम भी विद्यार्थियों को शारीरिक दण्ड से मुक्त शिक्षा दिये जाने की पैरवी करता है। शिक्षा का अधिकार कानून में बच्चों के साथ मारपीट को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है। स्कूलों में बच्चों को मारपीट से बचाने के लिए अब अनेक नियम कानून बना दिये जाने के बाद भी स्थिति संतोषजनक नहीं है। शिक्षक बच्चों के साथ मारपीट कर रहे हैं।
पिछले साल की बड़ी घटनायें
बैतूल जिले में शिक्षक की पिटाई से एक बच्चे की मौत हो गई थी, जबकि दूरस्थ ग्रामीण अंचलों में बच्चों के साथ होने वाली मारपीट की घटनाओं पर प्रभावी कार्रवाई भी नहीं हो पाती है। इंदौर में एक महिला शिक्षक की पिटाई के बाद छात्र चलने को मोहताज हो गया है। इस स्थिति में बच्चों पर शिक्षकों का डंडा लगातार चल रहा है। वहीं बच्चों के परिजनों में भी एक डर अक्सर बना रहता है। सरकार बच्चों की पिटाई को पूरी तरह रोकने में नाकाम नजर आ रही है। बच्चों को मारपीट से बचाने के लिए जो कानून बनाने गये, वे कागजी साबित हो रहे हंै जिनका शिक्षकों पर कोई असर नहीं हो रहा है। शायद यही कारण है कि स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

 

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