पुलिस कर्मियों की ज़िन्दगी की एक झलक

अगर बात करें हमारे पुलिस डिपार्टमेंट की तो पुलिस डिपार्टमेंट देश की रीड की हड्डी कहलाता है लेकिन अगर यही रीड की हड्डी किन्ही कारणों से कमज़ोर पढ़ जाए तो बात पुरे देश की तबियत पर आजाती है। लेकिन देश की सुरक्षा के लिए दिन रात मेहनत करने वाले यही पुलिस कर्मी अपने काम और अपनी ज़िन्दगी से खुश नहीं हैं।

इसी कारणवश पुलिस कर्मियो ने जनता और ह्यूमन राइट्स से कुछ सवाल किये जिनको सुनकर आपको सच में पुलिस डिपार्टमेंट और यहाँ काम करने वाले कॉन्स्टेबल्स पर तरस आ जाएगा।

इतने एडवांस समय में जहां आज देशभर में ह्यूमन राइट्स की बात होती है वहीं पुलिस कांस्टेबलस को एक छुट्टी लेने के लिए अपने अधिकारिओं का मूं ताकना पड़ता है।  उनकी वो एक छुट्टी अधिकारिओं के मूंड पर निर्भर होती है।
ये अधिकारी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक जब चाहें किसी कांस्टेबल का अनुशासन हीनता में नाम देके उसका नाम बिगड़ सकतें है।

सूत्रों के अनुसार जब कोई कर्मचारी मज़बूरी में अनुपस्थित रहता है तो उसकी तनख्वा काटने के बाद भी उसकी आधी तनख्वा दंड के रूप में काट ली जाती है, रात दिन काम करने के बाद पुरे 24 घंटे हाज़िरी देने वाले ये पुलिस कर्मी अपने सुख दुःख में अगर एक छुट्टी ले लें तो उन्हें एक भरी कीमत चुकानी पड़ती है।
वैसे कहने को तो पुलिस डिपार्टमेंट में साल में 82 छुटियां लेने का आधिकारिक प्रावधान होता है  लेकिन ये छुट्टियां कांस्टेबल अपनी मर्जी से नही ले सकते। अब सवाल उठता है कि क्यों कोई कांस्टेबल अपने परिवार से दूर है जब वो कोई कार्यवाही अपनी मर्जी से नहीं कर सकता।  उसे बस पुलिस की उपस्थिति दर्शाने के लिए या किसी के आदेश का पालन करने के लिए उपयोग किया जाता है तो उन्हें क्यों उनके होम सर्किल में पोस्टिंग नहीं दी जाती।
इन सवालों का जवाब ढूंढने निकलें तो सच में पूरे सिस्टम की धज्जियाँ उढ जाएँगी।
इस बढ़ती महंगाई के चलते कम वेतन दिया जाता है और इतना ही नहीं घर का किराया भत्ता भी कम दिया जाता है। देखा जाए तो इनकी सैलरी सिर्फ 8 घंटे काम के लिए मिलने वाले अन्य विभाग के लोगो से भी कम है जबकि नोकरी 24 घंटे की है।
उत्तराखंड मानव अधिकार आयोग ने 3 गुना सैलरी बढ़ाके देने की बात की है कोर्ट ने होम मिनिस्ट्री से जवाब माँगा, हमारे यहाँ मानव अधिकार आयोग चुप चाप तमाशा देख रहा है।
क्या पुलिस को इंसान नहीं समझा जाता इनके आराम की कहीं कोई गुंजाईश नहीं है, रोज शारीरिक आराम का दायरा फिक्स नही किया गया।
पुलिस को क्यों खुद निर्णय लेने और कार्यवाही करने की स्वतंत्रता नहीं है  अगर उन्हें ऐसी स्वतंत्रता दी जाएगी तो वो और भी बेहतर काम सकेंगे।
आज हमारे देश में आजाद भारत की गुलाम पुलिस देखने को मिल रही है, जिसमे अंग्रेजी हुकूमत की झलक साफ नजर आ रही है क्योकि पुलिस रेगुलेशन में चौबीस घंटे ड्यूटी है और सप्ताह में एक भी छुट्टी नहीं है।
सन् 1861 में जो कानून अंग्रेजो ने पुलिस को अपने फायदे की तरह उपयोग करने के लिए बनाया था आज भी वही प्रक्रिया जारी है।
एक तरफ वो पुलिस अफसर हैं जो मज़बूरी में भी छुट्टी नहीं ले सकता और दूसरा जिसके पास पोलिटिकल पॉवर है या अधिकारियो से संपर्क है वो मजे मार रहा है।
हमेशा आप लोगों ने पुलिस के खिलाफ ख़बरें तो बहुत देखी होंगी लेकिन कभी किसी ने उनकी ज़िन्दगी की गहराई में जाकर उन्हें समझने की कोशिश नहीं करी होगी के किस तरह वो दिन रात अपनी ड्यूटी को देकर हमें सुरक्षित रखने का प्रयास करते हैं। कभी कभी किसी एक की गलती के कारण जनता पुरे डिपार्टमेंट को ही गलत समझने लगती है जो की गलत है।
आप को यह जानकार आश्चर्य होगा कि पुलिसकर्मी जिस थानो या चौकियों पर रह रहें है वहां 70-80 प्रतीशत जगहो पर लैट्रीन, बाथरूम की सुविधा नहीं हैं जबकि कई पुलिस अधिकारी एक सरकारी बंगला,गाड़ी आदि  सुविधाओ का फायदा अपने पूरे परिवार के साथ उठा रहें हैं ।
ऐसी अनेक बाते है जिसमे पुलिस विभाग बहुत पीछे है बस कागजो में बात कहने से ही डिपार्टमेंट आगे नही बड़ सकता।
आज भी हमारे देश में जहां ह्यूमन राइट्स की दुहाई दी जाती है वहां एक ज़मीनी स्तर का अधिकारी अपनी बात नहीं रख सकता। इस कूटनीति के चलते न ही देश तरक्की कर सकता और न ही देश में रहने वाले लोग।

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