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पार्टी को लेकर कर्णधारों में जंग . सोनिया व राहुल ब्रिगेड आमने सामने

अरूण पाण्डेय
राहुल के टीम की बात की जाय तो महासचिवों को लिखे गए पत्र पर सबसे पहले परेश धनानी का हस्ताक्षर दिखता है। धनानी की छवि जमीनी नेता की है और वह गुजरात यूथ कांग्रेस के चीफ रह चुके हैं। उन्होंने मोदी के करीबी पुरुषोत्तम दास रुपाला और दिलीप संघानी को पिछले दो विधानसभा चुनावों में मात दी है। कुलजीत सिंह नागरा और संजय कपूर पंजाब और उत्तर प्रदेश से विधायक हैं। गिरीश चोडंकर गोवा से आते हैं और वह एनएसयूआई के इंचार्ज हैं।अन्य नेताओं में उत्तराखंड के प्रकाश जोशी और पश्चिम बंगाल के शुभंकर सरकार हैं। भूपेन बोरा और राणा गोस्वामी असम से विधायक हैं। सूरज हेगडेे कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स के पोते हैं। अन्य नेताओं में राजस्थान एनएसयूआई के पूर्व चीफ जुबैर खान, पूर्व सांसद हरीश चैधरी, दिल्ली के पूर्व विधायक नसीब सिंह और तमिलनाडु के पूर्व विधायक चेल्लाकुमार हैं जबकि 14वें सेक्रेटरी शकील अहमद खान हैं जो एसएफआई, लोजपा से होते हुए कांग्रेस में आए हैं और पिछले कुछ चुनावों में अपनी जमानत तक जब्त करा चुके हैं। यहां यह बताना उचित होगा कि यूथ कांग्रेस में टैलेंट हंट प्रोग्राम के बाद जिन्हें पार्टी में जगह दी गई। पार्टी में इनमें से कुछ नेताओं की छवि जमीनी नेताओं की है, तो कुछ को नेटवर्किंग का उस्ताद माना जाता है जबकि कुछ नेताओं को राहुल की हां में हां मिलाने वाले के तौर पर देखा जाता है। हां में हां मिलाने वाले नेताओं से ही अन्य नेताओं को इतराज है कि आखिर पार्टी में यह कौन सा काम कर रहें हे जिससे राहुल गांधी जी इतना प्रभावित है ।
सही मानये में देखा जाय तो मामला कांग्रेस पार्टी के भीतर चल रहे अन्र्तद्वन्द का नही है , गांधी परिवार ही इस मसले पर बिखरा हुआ है , सोनिया गांधी ने जिस योग्यता को देखकर अपनी टीम तैयार की और दस वर्षो तक शासन किया , वही टीम अब राहुल गांधी की टीम बेकार सी दिखती है। राहुल गांधी ने एक युवा टीम उसके समान अधिकार वाली खडी कर दी जो सिर्फ उनको रिपोर्ट करती हो न कि उनकी मां को , प्रियंका गांधी को लगता है कि राहुल गांधी का के्रज नही रहा अब मौका है कि अपनी दादी की तरह वह पार्टी में नयी जान फूंक कर ,उसी तरह की नेत्री बन जाय , जिस तरह वह पार्टी में थी । बडे नेताओं में जो लोग है जिन्हें पार्टी ने अब तक पाल रखा है उनके प्रति दिग्विजय सिंह का कहना है कि उन्हें उसी तरह किनारे कर देना चाहिये जैसा कि भारतीय जनता पार्टी ने किया है क्योंकि ये बडे नेता अपने स्वार्थ और परिवार से ऊपर निकल ही नही पाये । पार्टी से पहले इन्हें अपना फायदा चाहिये।
तेजी से बदलते इस धटनाक्रम में पार्टी के अंदर उलटफेर होने की संभावना से इंकार नही किया जा सकता क्योंकि जिस टीम को लेकर सोनिया गांधी ने देश की बागडोर मनमोहन सिंह के हाथों में देकर पिछले दस वर्षो तक राज किया , उसी टीम को हार का कारण बताकर टीम राहुल के 14 सचिवों की तरफ से बीते लोकसभा चुनाव में निशाना साधा गया जिससे पार्टी की छवि काफी खराब हुई और लोकसभा चुनाव में औधें मुंह गिरी । उसके बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के समूह ने अपने आप को एकजुट कर लिया है जिसके कारण अन्दरूनी तौर पर अबतक धमासान मचा हुआ है। अब पार्टी में तीन तरह की टीमें बन गयी है, युवा वर्ग,मध्यम वर्ग और वरिष्ठ नेताओं की टीम । जिन 14 सचिवों ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ मोर्चा खोला है, उनमें 13 सचिव राहुल के लीडरशिप प्रोग्राम के विजेता हैं।इन युवा नेताओं ने राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों और संगठन में होने वाले चुनावों के पहले पुराने नेताओं पर निशाना साधकर पार्टी में टीम राहुल की स्थिति को मजबूत किए जाने की अपनी मंशा साफ कर दी है। हालांकि इन युवा नेताओं को पार्टी में मौजूद दूसरी पीढी के नेताओं का समर्थन नहीं मिला। वहीं पुराने नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि वह इतनी जल्दी मैदान छोडने वाला नहीं है। पार्टी के भीतर के सूत्रों की मानें तो वाले समय में संगठन में फेरबदल के दौरान इसतरह के और भी मामले सामने आते रहने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 14 सचिवों को आगे से सार्वजनिक तौर पर कुछ भी नहीं बोलने का आदेश देकर उन्हें चुप करा दिया है। दूसरी तरफ परदे के पीछे वह अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुट गया है। इसे देखते हुए आने वाले समय में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तनाव की स्थिति बनती दिख रही है। इसके बावजूद सब यह जानते हैं कि 14 सचिवों में से 13 सचिव किस कदर राहुल गांधी के करीब हैं। कांग्रेस में टीम राहुल और पुराने नेताओं के बीच चल रही खींचतान के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व ने युवा नेताओं को सधा हुआ जवाब दिया है। पार्टी सचिवों ने कांग्रेस के महासचिवों को पत्र लिखकर मीडिया में सार्वजनिक तौर पर उस तरह की टिप्पणी देने से परहेज करने के लिए कहा था, जो राहुल गांधी की लीडरशिप पर सवाल खडे कर सकता है। 14 सचिवों के लिखे गए पत्र का जवाब देते हुए कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने उन्हें सार्वजनिक तौर पर पार्टी नेतृत्व को सलाह देने से बचने के लिए कहा है। अब जबकि जनार्दन द्विवेदी खुद ही राहुल ब्रिगेड के निशाने पर हैं। उनके इस आदेश को एक तरह से पार्टी के युवा नेताओं पर लगाम लगाने की कोशिश माना जा रहा है।
पाटी के भीतर चल रही खींचतान के बीच टीम राहुल को साफ कर दिया है कि कांग्रेस में दो तरह के नियम नहीं हो सकते। कांग्रेस के भीतर पैदा हुई इस स्थिति को संभालने में द्विवेदी ने काफी सूझ-बूझ से काम लिया और इस दौरान उन्होंने संगठन के अपने लंबे अनुभव का इस्तेमाल किया। पार्टी के सचिवों के एक समूह ने जनार्दन द्विवेदी को पत्र सौंपा था ताकि वह उसे अन्य महासचिवों को भेजें।इस मामले में थोडा आगे बढते हुए उन्होंने इस पत्र की कॉपी पार्टी महासचिवों के साथ वर्किंग कमिटी के सदस्यों, पार्टी स्टेट प्रेजिडेंट और कांग्रेस के सभी संगठनों के प्रमुखों को भेजी। 14 सचिवों को दिए गए जवाब से द्विवेदी ने यह साफ करने की कोशिश की है कि वह भी उसी परिपाटी के समर्थक हैं, जिसके खिलाफ उन्हें पत्र लिखा गया है। उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेताओं को इन 14 सचिवों के खिलाफ नोटिस जारी किए जाने की जानकारी दी है। इस पत्र के साथ द्विवेदी ने पार्टी के महासचिवों को एक पत्र और लिखा है जिसमें कहा गया है, श्मुझे इस बात का भरोसा है कि मेरे सभी साथी इस मसले को संवदेनशीलता के साथ उठाएंगे। मैं उन्हें (14 सचिवों को) एक अलग पत्र लिखकर मीडिया के जरिए सार्वजनिक तौर पर सलाह देने से बचने की सलाह दे रहा हूं।
जनार्दन द्विवेदी ने जो कुछ भी लिखा है, वह 14 सचिवों को आगे से कुछ नहीं बोलने का आदेश दिए जाने जैसा है। हालांकि उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से उम्मीद जताई है कि वह अपने जूनियर नेताओं के विचारों को पूरी संवेदनशीलता के साथ समझने की कोशिश करेंगे। उन्होंने कहा, श्हां, मैं इससे सहमत हूं और मेरा मानना है कि किसी को भी गलत बातें नहीं कहनी चाहिए।श् द्विवेदी के पत्र का तात्कालिक असर यह हुआ कि इन 14 सचिवों में से कोई भी अब सार्वजनिक तौर पर टिप्पणी करने को तैयार नहीं है और पार्टी के भीतर दूसरे नेता भी फिलहाल इन्हें अपना समर्थन देते नजर नहीं आ रहे हैं। इसी क्रम में इसी तरह प्रदेशों में उत्तर प्रदेश की कांग्रेस कमेटी को लेकर सबसे पहले मतभेद आने की संभावना है, रीता बहुगुणा जोशी को विधानसभा में हार का दोषी मानते हुए नये नेता व पूंजीपति निर्मल खत्री को प्रदेश की कमान दी गयी थी लेकिन हालात जस के तस है।अब लोकसभा में जब हार हुई है तो पार्टी का आलाकमान तीसरे नेता की तलाश में जुट गया है बहुगुणा खेमे का कहना है कि जब इसी तरह अध्यज पद पर काम करना था तो रीता जी क्या बुरी थी उनका कार्यकाल तो इससे बेहतर था उन्हें ही वापस सौंप दिया जाना चाहिये ।खबरें यहां तक है कि कई बार रामपुर से विधायक रह चुके व लगभग दो दशक तक कांग्रेस पार्टी के विधानसभा में नेता रहे और अब राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी को नया अध्यक्ष बनाने की तैयारी है ।

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