इस लिये दिल्ली में चुनाव हार गयी भाजपा

अरूण पाण्डेय
नईदिल्ली । भारतीय जनता पार्टी का दिल्ली विधानसभा चुनाव में सूपडा साफ हो गया है। आम आदमी पार्टी ने उसे हर क्षेत्र में हराने के बाद एैसा बना दिया है कि उसका हर बडा नेता आज कुछ भी कहने से डर रहा है। आखिर क्यों ? इस पर अब पूरी दिल्ली में चर्चा हो रही है । किरण बेदी ने पार्टी के कार्यकर्ताओं व नेतृत्व से माफी मांग ली है और चैनलों पर आने से लोग बच रहे है मजबूरी में मीडिया से दूर रखे जाने वाले शहनवाज हुसैन को बचाव के लिये उतारा जा रहा है।पार्टी के वरिष्ठ नेता किर्ती आजाद ने पार्टी से मांग की है कि दोषी लोगों को सजा मिलनी चाहिये । जिसपर पार्टी के प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने सिर्फ इतना कहा कि सवाल तो लाजमी है । किन्तु कहीं कुछ न कुछ तो है जो इतनी बडी पराजय हुई ।
भारतीय जनता पार्टी के हर पक्ष पर नजर डाली जाय तो सबसे ज्यादा जो प्रभाव उनकी जीत पर पडा। वह है बडे नेताओं को दरकिनार कर किरण बेदी को सीएम पद की प्रत्याशी घोषित करना और किरण बेदी का तानाशाही रवैया पार्टी के कदावर लोगों के प्रति अपनाना। उनके नामांकन के साथ ही तय हो गया था कि पार्टी में अन्दरूनी तौर पर मतभेद है जिसका खुला उदाहरण उनके प्रचार प्रमुख व पिछले कई दशकों से पार्टी की सेवा करने वाले नरेश टंडन का इस्तीफा था । भले ही पार्टी इसे गंभीरता से न ले लेकिन पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का उस समय कहना कि हमने नरेश टंडन का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है , पार्टी पर भारी  पड गया , जिसकी परिणति इस प्रकार हुआ।
इस मतभेद की रूपरेखा तभी तय हो गयी थी जब पिछले चुनाव में सीएम पद के प्रत्याशी हर्षवर्द्धन को सांसद का चुनाव लडाया गया व केन्द्र में मं़त्री बनाया गया, फिर उनका मं़त्रालय बदल दिया गया। उसके कुछ ही दिनों बाद उस समय प्रदेश अध्यक्ष रहे विजय गोयल को राज्यसभा टिकट दिया गया और उन्हें दिल्ली की सियासत से दूर कर दिया गया, इससे पहले वह केन्द्रीय कार्यालय में राष्टृीय सचिव थे, जहां से उन्हें हटाकर प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था। उसके बाद सतीश उपाध्याय को प्रदेश अघ्यक्ष बनाया गया। अब तक दिल्ली पर राज करने वाला पंजाबी वर्ग पूरी तरह से विरोघ में आ गया। यह बात भी खुलकर सामने आ गयी थी कि नेतृत्व परिवर्तन को नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है।
कुछ दिनों बाद चुनाव की तारीखें तय हुई और चुनाव के प्रत्याशियों की घोषणा हो गयी , उसके बाद अचानक एक दिन सामने आया कि किरण बेदी दिल्ली की सीएम पद की प्रत्याशी होगी, जिसने माहौल को खराब किया। भारतीय जनता पार्टी अपने पिछले इतिहास को भूल गयी । उसने वहीं काम किया जो उसने 1998 में किया था , सुषमा स्वराज को सीएम सभी बडे नेताओं को दरकिनार करके बनाया था और उसका परिणाम यह हुआ कि अगले चुनाव में पार्टी क्लीनस्वीप कर गयी और पार्टी को तब से लेकर अब तक संघर्ष कर रही है।पिछली बार थोडा हालात ठीक थे लेकिन पैरासूट सीएम उम्मीदवार होने से पार्टी वहीं पहुंच गयी , जहां वह 1998 में थी।
चुनाव के दौरान प्रदेश कार्यालय में केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और अनंत कुमार का संवाददाता सम्मेलन संबोधित करना सीधे-सीधे प्रदेश नेतृत्व की अनदेखी थी, इससे भी कहीं न कहीं कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा और वह पूरी तरह पार्टी से कट गया । भाजपा की हार के जो अन्य कारण है उनमें मीडिया समन्वय की कमी , अतिविश्वास व वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा करना भी है । जिस तरह से कार्यकर्ताओं व नेताओं को गण्ेाश परिक्रमा करने वाले नेताओं द्वारा अपमानित किया गया, उस तरह से पहले कभी नही हुआ।लोगों का मानना है कि अगर शीला दीक्षित के समय में प्रदेश अध्यक्ष रहे विजेन्द्र गुप्ता के ही नेतृत्व में चुनाव लडा गया होेता तो शायद बेहतर होता । उनका मानना था कि उस समय शीला दीक्षित के लिये मुसीबत केजरीवाल नही, बल्कि विजेन्द्र गुप्ता थे और मामला पार्टीगत न होकर व्यक्तिगत हो गया था।बाद में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद खत्म हुआ था।
इस चुनाव में सबसे खास बात यह थी कि भाजपा के पंडित पंत मार्ग स्थित प्रदेश कार्यालय पर केंद्रीय नेतृत्व ने चुनाव के माहौल में नेताओं की तो फौज खडी कर दी लेकिन कार्यकर्ता की लगातार उपेक्षा होती रही और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर एयरकंडिशनर कमरों में बैठकर राजनीति करने का आरोप लगता रहा। नेता रणनीति बनाकर कार्यकर्ताओं पर थोपते रहे जबकि केजरीवाल जनता के बीच जाकर सीधा संवाद करते रहे।जिसका उन्हें लाभ मिला।
केंदीय नेतृत्व ने दिल्ली चुनाव के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित अपने सौ से अधिक सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों तक को मैदान में उतार दिया। हालांकि ये नेता अपनी सभाओं के माध्यम से पार्टी के लिए भीड जुटाना तो दूर उल्टा विवादित बयान देकर मुश्किल ही खडी करते रहे। दिल्ली की जनता में इन तमाम सांसदों की कोई व्यक्तिगत पहचान नहीं होने से यह प्रयोग पूरी तरह विफल साबित हुआ। पार्टी को इस हार से सबक लेना चाहिए, कितना लिया यह पांच साल बाद जब फिर चुनाव होगा तब पता चलेगा। लेकिन तबतक ?
खैर अब जो हालात है उसमें पार्टी के लिये सिर्फ मंथन का काम बाकी रह गया है।सतीश उपाध्याय के इस्तीफे पर विचार होना बाकी है जो आज होगी , प्रभात झा ने भी हार स्वीकार कर लिया और अब हाईकमान यह मानने लगा है कि इसी वर्ष के अंत में बिहार होने वाले विस चुनाव में यही हालात हो सकते है क्योंकि वहां पर भी भाजपा ने ज्यादातर सीटें लोकसभा की जीती है और वहां राजनैतिक अस्थिरता चल रही है।

 

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