आप’ ने भी भरोसे का खून कर दिया : जयकृष्ण गौड़

आम आदमी पार्टी (आप) ने साफ सुथरे राजनैतिक विकल्प की बात कह कर लोगों को प्रभावित किया, हालांकि २०१४ के लोकसभा चुनाव में भारत विशेषकर, दिल्ली की जनता ने आप को नकार दिया। जनता की सूझबुझ की इसलिए सराहना करनी होगी कि केन्द्र में गड़बड़ घोटाले की कांग्रेसनीत सरकार को नकार कर भाजपा को न केवल पसंद किया वरन स्पष्ट बहुमत देकर नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर दिया। अरविंद केजरीवाल ने पूरे देश में अपने प्रत्याशी खड़े किये थे, लेकिन इस नई पार्टी को जनता ने केन्द्रीय नेतृत्व के लायक नहीं समझा, उसके केवल दो सदस्य जीत सके।
हालांकि बाद में हुए दिल्ली राज्य के चुनाव में आप को अपेक्षा से अधिक बहुमत मिला। सत्तर सीटों में आप को ६७ और भाजपा को केवल तीन सीटे मिल सकी। जिस तरह लोकसभा में भाजपा को स्पष्ट बहुमत देकर अपनी नीतियां लागू करने का अवसर दिया, उसी तरह प्रयोग के रूप में आप को छोटे राज्य में बहुमत देकर वर्तमान राजनैतिक संस्कृति के विकल्प के रूप में शासन करने का पूरा अवसर दिया। अब सवाल यह है कि क्या आप के अरविन्द केजरीवाल एवं उनके समर्थक नेताओं ने जिस राजनैतिक विकल्प की बात और दावा चुनाव के समय किया, उसके अनुसार क्या प्रमाणिकता के चुनाव लड़ा? इस सवाल का उत्तर अरविंद केजरीवाल अभी तक दे सकते थे? चूंकि दिल्ली में उनकी सरकार है, बिना किसी विरोध के वे दिल्ली के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हो गये, उन्होंने अपने विश्वसनीय साथी मनीष सिसोदिया को उपमुख्यमंत्री पद दिया। प्रारंभ में ऐसा लगा कि जिस राजनैतिक संस्कृति के विकल्प का दावा केजरीवाल और आप के अन्य नेताओं ने किया, उसी के अनुरूप दिल्ली की आप सरकार का आचरण और नीतिगत दिशा होगी। इस विश्वास का दम उस समय घुटने लगा जब अरविन्द केजरीवाल अपना उपचार कराने के लिए बैंगलोर गये, प्राकृतिक उपचार के लिए वहां अक्सर राजनेता जाते हैं। इस उपचार से केजरीवाल को स्वास्थ्य लाभ हो रहा है।

दूसरी ओर आप गंभीर आंतरिक और बाहरी आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। पहले आप के संस्थापक सदस्य प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव पर आप के संजयसिंह ने यह आरोप लगाया कि ये दोनों दिल्ली में आप पार्टी की पराजय की साजिश कर रहे थे। इसके लिए इन्होंने लोगों को चंदा देने के लिए मना किया। यह भी आरोप लगाया कि ये दोनों आप को न केवल पराजित कराने की साजिश कर रहे थे, वरन् इन्होंने आप पर काबिज होने की तैयारी कर ली थी। पहले प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव आरोपों से बचते रहे, इन दोनों ने कहा कि समय पर सच्चाई सामने आ जायेगी। इसके बाद आप के पूर्व विधायक राजेश गर्ग का स्टिंग ऑपरेशन की टेप उजागर हुई, इसमें कांग्रेस के छह विधायकों को तोडक़र दिल्ली की निलंबित विधानसभा के समय आप को समर्थन देने की बात कहते हुए अरविंद केजरीवाल को बताया गया। यदि छह कांग्रेस विधायक विद्रोह कर नई पार्टी बनाकर आप को समर्थन देते तो आप की सरकार बन सकती थी, यह भी कहा गया कि मुस्लिम विधायक भाजपा के साथ नहीं जा सकते। दूसरा गंभीर आरोप कांगे्रस के नेता आसिफ मोहम्मद ने लगाया, उन्होंने कहा कि आप नेता संजय सिंह ने नोएडा और एक पत्रकार के घर मुझे बुलाकर कहा था कि यदि आप छह कांगे्रस विधायकों को तोडक़र आप को समर्थन देने के लिए राजी करते है तो आप (आसिफ मोहम्मद) को मंत्री पद दे देंगे और अन्य पांच कांग्रेस विधायकों को अन्य पदों पर आसीन करवा देंगे। उनसे यह भी कहा गया कि मुस्लिम विधायक हमको समर्थन दे सकते है, क्योंकि वे भाजपा के साथ नहीं जा सकते। हालांकि स्टिंग टेप को आसिफ ने नहीं सुनाया। उनका कहना था कि यदि संजय सिंह इन आरोपों को गलत बताते है तो वे स्टिंग ऑपरेशन को उजागर कर देंगे।

जिस तरह अरविन्द केजरीवाल तोड़ फोड़ कर बहुमत का जुगाड़ करना चाहते थे, इन बातों से स्टिंग ऑपरेशन के द्वारा पर्दा उठ गया है। सबसे बड़ी साजिश तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की है। आप अल्पसंख्यक मोर्चा के नेता सईद आजाद द्वारा एक और साजिश का टेप जारी हुआ, जिसमें अरविन्द केजरीवाल ने मुस्लिमों के बीच कहा कि यदि मुस्लिम मोदी के रथ को दिल्ली में रोकना चाहते है तो उन्हें आम आदमी पार्टी को समर्थन करना चाहिए। इस प्रकार वोट बैंक की राजनीति का विरोध करने वाले केजरीवाल ने मुस्लिमों का आप के पक्ष में उसी तरह की वोट बटोर ने की राजनीति की, जिस तरह कांग्रेस मुलायम, लालू आदि कथित सेक्यूलर जमात करती रही है। इस बारे में दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम के उस फतवे का संदर्भ भी जोडऩा होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि मोदी को रोकने के लिए मुस्लिमों को आम आदमी पार्टी को वोट देना चाहिए। इस बारे में शाही इमाम के भाई ने यह भी कहा था कि आम आदमी पार्टी का प्रमुख नेता शाही इमाम से मुस्लिमों का समर्थन प्राप्त करने के लिए मिला था।

मजहबी साम्प्रदायिकता को उभारकर अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में चुनाव लड़ा। भाजपा और मोदी को मुस्लिम विरोधी बताकर वोट बटोरने का साम्प्रदायिक खेल अरविंद केजरीवाल ने भी उसी तरह खेला जो कांग्रेस खेलती रहेगी। चूंकि दिल्ली में कांग्रेस के खिलाफ लहर थी, इसलिए शाही इमाम के फतवे के बाद प्राय: सभी मुस्लिमों ने आम आदमी पार्टी को समर्थन दिया। दिल्ली राज्य के मतदाताओं की संख्या करीब सवा करोड़ है, उसमें भी कई क्षेत्रों में मुस्लिम वोट निर्णायक है।

आप के अंदर और बाहर जो आरोप लग रहे है, जो स्टिंग ऑपरेशन उजागर हुए है, उससे यह तो स्पष्ट हो गया कि आम आदमी पार्टी का राजनैतिक आचरण भी उसी तरह का है, जो अन्य राजनैतिक दलों का रहा है। उसको भी वे ही हथकंडे अपनाये, जो अन्य दल अपनाते है। कांग्रेस एक सौ तीस वर्ष पुरानी पार्टी है, इसमें कई प्रकार के विचारों का प्रवाह जारी रहा। यह भी सच्चाई है कि उसके नेतृत्व की स्वतंत्रता के संघर्ष में प्रमुख भूमिका रही, उसका परिवारवादी स्वरूप इंदिराजी के समय से रहा। इतने गड़बड़ घोटालों के आरोपों के बाद भी कांग्रेस में अनुशासन की मर्यादा है। कांगे्रस २०१४ के लोकसभा चुनाव की करारी पराजय के बाद अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में १९५१ में राष्ट्रवादी विचार आधारित जनसंघ का जन्म हुआ, आपातकाल के विरोध में कांग्रेस विरोधी दलों ने जनता पार्टी बनाई, दोहरी सदस्यता के सवाल पर जनसंघ घटक ने अलग होकर १९८० में भारतीय जनता पार्टी गठित की, इसके विचार और राजनैतिक दिशा भी बही है, जो जनसंघ की रही। कुछ अपवादों को छोडक़र जनसंघ से लेकर भाजपा तक वैचारिक प्रतिबद्धता रही और अनुशासन की लक्ष्मण रेखा का किसी ने उल्लंघन नहीं किया। जितना कलह और आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला एक वर्ष की आम आदमी पार्टी में चल रहा है, उतना कभी पैतीस वर्ष पुरानी भाजपा में दिखाई नहीं दिया। इसी प्रकार कांग्रेस टूटकर जुड़ती रही लेकिन उसमें भी आंतरिक कलह की ऐसी नहीं बनी। आम आदमी पार्टी चाहे साफ सुथरे राजनैतिक विकल्प की बात करती हो, लेकिन वह शिशु अवस्था में ही संक्रमण बीमारियों से इतनी त्रस्त है कि अरविन्द केरजीवाल चाहे स्वस्थ होकर बैंगलोर से वापिस लौटकर आप की कमान सम्हाल ले, लेकिन जनता का यह भ्रम दूर हो गया कि आप एक नई राजनीति की शुरूआत करेगी। मुलायम, लालू की पार्टी से भी निचले स्तर पर आप पहुँच गई है। यह मुहावरा सच्चाई को व्यक्त करता है कि जो जैसा करेगा, वैसा ही भुगतेगा।

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