अब यदा-कदा दिखायी पड़ते हैं मदारी, सपेरे और बाजीगर

जगदलपुर। अब इन खेलों के कोई भी कद्रदान नहीं है। संपेरे बीन बजाकर मोहपाश में बांधने की क्षमता रखते हैं। अब सपेरे काम छोडक़र मजदूरी में लगे हैं तथा अपना पुश्तैनी पेशा खास दिनों में ही अपनाते हैं।
भारत विभिन्न परंपराओं और संस्कृति का देश है। प्राचीन संस्कृति का एक रंग सपेरों के बीन की एक मधुर तान भी है। ये तान किसी को भी मोहपाश में बांधने की क्षमता रखती है। बचपन से ही सांप और बीन खेलकर निडर हुए अमरनाथ कहते है कि अब वे इस पुश्तैनी पेशे को छोडऩे को बाध्य हैं, क्योंकि अब हमारे इन खेलों को देखने वाला कोई नहीं है, बच्चे भी इसे अपनाना नहीं चाहते।
एक समय था जब हमारा देश सांप-सपेरों का देश माना जाता था। मंदारी,संपेरे और बाजीगर जब कुछ करतब दिखाने लगते थे, तो लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था। परंतु अब ऐसा नहीं है। गौरतलब है कि टोकरों में सांप को कैद करना भी पशु-पक्षी क्रूरता अधिनियम के अंतर्गत जीव अत्याचार की श्रेणी में आता है। इस पेशे में संपेरे इस अधीनियम को लेकर डरे हुए तो रहते ही हैं, लेकिन पुश्तैनी पेशे से लगाव होने के कारण वे सांपों को लेकर घूमते भी है।
अमरनाथ ने बताया कि वह इंदौर से आया है और टोकरे में नाग-नागिन का जोड़ा रखकर दो-चार रूपये कमाने में लगा है। उसने बताया कि सावन के महीने के अलावा नाग पंचमी व महाशिवरात्रि के समय ही वे जंगल से सर्प पकड़ कर लाते हैं तथा कुछ दिनों के बाद उन्हें वापस जंगल में छोड़ देते हैं। उसने बताया कि दिनभर में 100-200 रूपये की आमदनी होती है। शहर में घूम-घूमकर रोजी रोटी कमाने के बाद वे बाकी दिनों में मजदूरी करते हैं। उनके बच्चे पढ़े-लिखे होने के कारण इस पेशे को नहीं अपना रहे हैं। उसने बताया कि संपेरे जाति के अनेक लोगों ने यह काम छोड़ दिया है। कुछ लोग परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं तो कुछ लोग मजबूरी में यह काम कर रहे हैं। फिल्मों में भी कम्प्यूटरीकृत सांप के चलन के कारण फिल्मों से संपेरा जाति के लोगों का नाता टूट गया है। जिससे उन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

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