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दिल्ली: हौज खास डियर पार्क के हिरणों पर ‘डेथ वारंट’? ट्रांसलोकेशन के बाद 261 में से सिर्फ 17 जीवित, उठे गंभीर सवाल

दिल्ली: हौज खास डियर पार्क के हिरणों पर 'डेथ वारंट'? ट्रांसलोकेशन के बाद 261 में से सिर्फ 17 जीवित, उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली: दिल्ली के प्रसिद्ध ए.एन. झा डियर पार्क (हौज खास) के हिरणों को राजस्थान के टाइगर रिजर्व में भेजने के फैसले ने अब एक बड़े विवाद का रूप ले लिया है। सामाजिक संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि ‘ट्रांसलोकेशन’ के नाम पर इन बेजुबान जानवरों को सीधे मौत के मुंह में धकेला जा रहा है। हाल ही में आए एक सर्वे ने इन आशंकाओं को सच साबित कर दिया है।

सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा: हड्डियों का ढेर और पैरों में रस्सियां

कोर्ट के निर्देश पर किए गए एक सर्वे में दिल दहला देने वाली सच्चाई सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में दिल्ली से भेजे गए 261 हिरणों में से केवल 17 ही जंगल में जीवित मिले हैं। बाकी हिरणों का क्या हुआ, इसका कोई पुख्ता रिकॉर्ड नहीं है। सर्वे के दौरान जंगल में हिरणों की हड्डियां बिखरी मिलीं और कुछ के पैरों में रस्सियां बंधी पाई गईं, जो शिकार या क्रूरता की ओर इशारा करती हैं।

पार्क के बाहर भारी विरोध प्रदर्शन

रविवार की सुबह हौज खास डियर पार्क के बाहर भारी विरोध देखने को मिला। इसमें एनिमल वेलफेयर सोसाइटी ऑफ इंडिया, न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी और जेएनयू-डीयू के छात्रों सहित बड़ी संख्या में मॉर्निंग वॉकर्स शामिल हुए।

प्रदर्शनकारियों के मुख्य आरोप:

  • लापरवाही: 14 घंटे के लंबे सफर के दौरान गर्भवती मादा हिरणों और बीमार जानवरों का कोई ख्याल नहीं रखा गया।
  • भ्रष्टाचार की आशंका: आरोप लगाया गया है कि कई जानवरों को रास्ते में ही मांस व्यापारियों को बेच दिया गया।
  • गाइडलाइंस का उल्लंघन: IUCN और CZA के नियमों को ताक पर रखकर बिना टैगिंग और बिना ट्रेनिंग के हिरणों को शिकारी जानवरों के बीच छोड़ दिया गया।

डियर पार्क की जमीन पर ‘व्यावसायिक’ नजर?

पर्यावरणविदों ने डीडीए (DDA) की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं। बताया जा रहा है कि 335 एकड़ की अरावली वन भूमि में से हिरणों के लिए केवल 10 एकड़ हिस्सा ही छोड़ा गया है। बाकी जमीन का इस्तेमाल कथित तौर पर रिसॉर्ट, बारात घर और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए करने की योजना है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर हिरणों को 20 एकड़ जमीन और दे दी जाती, तो उन्हें कहीं और भेजने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

बाघों के बीच ‘शर्मीले’ चीतल: कितना सही?

विशेषज्ञों का मानना है कि पिंजरे और पार्क में पले-बढ़े चीतल हिरण बेहद शर्मीले और कमजोर होते हैं। उन्हें अचानक रणथंभौर या मुकुंदरा जैसे टाइगर रिजर्व में छोड़ना उनके लिए आत्मघाती है। चीता प्रोजेक्ट के बाद से वैसे ही इन इलाकों में शिकार बनने वाले जीवों की संख्या घटी है, ऐसे में इन हिरणों का बचना लगभग नामुमकिन है।

प्रकृति प्रेमियों की मांग

प्रदर्शनकारी संगठनों ने मांग की है कि:

  1. हिरणों के ट्रांसलोकेशन पर तुरंत रोक लगाई जाए।
  2. गायब हुए हिरणों की उच्च स्तरीय जांच हो।
  3. डियर पार्क को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर वहां प्रबंधन में सुधार किया जाए न कि जानवरों को हटाया जाए।

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