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वजीरपुर हत्याकांड: मामूली कहासुनी में संतोष को चाकुओं से गोदा; भीड़ तमाशबीन बनी रही, खौफ में पूरा इलाका

वजीरपुर हत्याकांड: मामूली कहासुनी में संतोष को चाकुओं से गोदा; भीड़ तमाशबीन बनी रही, खौफ में पूरा इलाका

नई दिल्ली: नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली का वजीरपुर इंडस्ट्रियल एरिया एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह कोई औद्योगिक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक युवक की बेरहम हत्या है। मछली मार्केट इलाके में 25 वर्षीय संतोष की सरेराह चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई। इस वारदात ने न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं, बल्कि समाज की संवेदनहीनता को भी उजागर किया है।

महज एक टक्कर और फिर खूनी अंत

संतोष, जो एक स्थानीय स्टील कंपनी में काम करता था, उस दिन सार्वजनिक शौचालय के पास मौजूद था। बताया जा रहा है कि नशे में धुत एक युवक (नेपाल नाम का संदिग्ध) उससे टकरा गया। इस छोटी सी बात पर विवाद इतना बढ़ा कि दो हमलावरों ने संतोष को घेर लिया। चश्मदीदों के अनुसार, एक हमलावर ने संतोष के हाथ पीछे से जकड़ लिए और दूसरे ने चाकुओं से ताबड़तोड़ वार कर उसे छलनी कर दिया।

भीड़ देखती रही, पर हाथ किसी ने नहीं बढ़ाया

घटनास्थल पर दर्जनों लोग मौजूद थे, लेकिन बदमाशों के रसूख और पुलिसिया कार्रवाई के डर से कोई भी संतोष को बचाने नहीं आया। संतोष की माँ और चाची ने रोते हुए बताया कि वहां मौजूद समोसे वाले और दुकानदारों ने सब देखा, लेकिन सब तमाशबीन बने रहे। लहूलुहान संतोष काफी देर तक शौचालय के अंदर तड़पता रहा, लेकिन अस्पताल ले जाने में हुई देरी उसकी मौत का कारण बनी।

अपराध का अड्डा बनते सार्वजनिक शौचालय

स्थानीय निवासियों में इस घटना के बाद जबरदस्त आक्रोश और दहशत है। लोगों का कहना है कि:

  • इलाके के सार्वजनिक शौचालय अब स्नैचरों और नशेड़ियों का अड्डा बन चुके हैं।
  • पिछले 6-7 महीनों में चाकुओं से हमले की एक दर्जन से अधिक वारदातें हो चुकी हैं।
  • रात के समय इस इलाके से गुजरना खतरे से खाली नहीं है।

कातिल के नाम से भी बोलने में डर रहे लोग

वजीरपुर की सड़कों पर सन्नाटा है। दिल्ली दर्पण की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि लोग अपराधियों को जानते हैं, लेकिन गवाह बनने को तैयार नहीं हैं। इलाके में व्याप्त यह दहशत बताती है कि अपराधियों के मन से पुलिस का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है।

फिलहाल पुलिस मामले की छानबीन कर रही है, लेकिन मृतक का परिवार इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहा है। सवाल वही है—क्या दिल्ली की सड़कों पर आम आदमी की जान इतनी सस्ती हो गई है?

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