मानवता की मिसाल- नारायण भाऊराव दाभाडकर

नेहा राठौर

आज हमारा देश महामारी के उस दौर से गुजर रहा है, जो आगे चलकर हमारे बाद आने वाली पीढ़ी के लिए इतिहास बनेगा। वो इस दौर से एकता और मानवता का सबक लेगी। इस देश ने कई बार जाति-धर्म के नाम पर खून-खराबा होते देखा है, लेकिन यह पहली बार होगा जब इस मुश्किल घड़ी में सभी लोग किसी का धर्म या जाति देख कर मदद नहीं कर रहे हैं बल्कि इंसानियत का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। जो आगे चलकर एक उदाहरण बनेगा।

जहां एक तरफ लोग महामारी के डर से अपनों को बीच राह में छोड़कर भाग रहे हैं, उन्हें घर से बाहर निकाल रहे हैं वहीं, दूसरी तरफ देश में कई लोग आज सभी भेदभाव को पीछे छोड़कर मदद के लिए आगे आ रहे है। ऐसा नहीं है मदद करने वाले सभी अमीर है या उनके संबंध बड़े लोगों से है। वो कहते है ना कि मदद करने के लिए सिर्फ दिल बड़ा होना चाहिए। ऐसा ही एक मामला नागपुर से सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग ने इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए सिस्टम के दावे की पोल खोल कर रख दी।

दरअसल, नागपुर में एक 85 साल के बुजुर्ग ने अपनी जान की परवाह किए बिना एक 40 साल व्यक्ति के लिए अपना ऑक्सीजन बेड दे दिया और खुद घर चले गये। अपना बेड दूसरे मरीज को देने वाले उस बुजुर्ग की तीन दिन बाद मृत्यु हो गई। इस बुजुर्ग का नाम नारायण भाऊराव दाभाडकर था। नारायण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। कुछ समय पहले वह कोरोना संक्रमित हो गए थे। ऐसे में उनकी बेटी ने जब देश में बेडस की किल्लत है उनके लिए इंदिरा गांधी सरकारी अस्पताल में बेड की व्यवस्था करवाई। उस समय नारायण का ऑक्सीजन लेवल 60 से नीचे था, लेकिन तब भी वह होश में थे।

बताया जा रहा है कि नारायण एंबुलेंस से खुद अपने पैरों पर चलकर अस्पताल में गए थे। उन्हें बेड मिला, उपचार शुरू हो गया। उसी समय उन्होंने एक शख्स को देखा, जो बेड के लिए तड़प रहा था। उसकी बीवी ने काफी रो रही थी, लेकिन उन्हें बेड नहीं मिला।

उस शख्स की परेशानी को नारायण से देखी नहीं गई और उन्होंने डॉक्टर से कहा कि मैं अब 85 का हो गया हूं, जिंदगी जी चुका हूं, इस जवान का जिंदा रहना मेरे लिए ज्यादा जरूरी है, उसके छोटे बच्चे हैं, मेरा बेड उन्हें दे दीजिए, मैं बेड नहीं ले सकता। इतना कहकर नारायण अपने दामाद के घर वापस चले गए।

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हालांकि जब वह अस्पताल से जा रहे थे, तब डॉक्टरों ने उन्हें काफी समझाया और बताया कि बेड नहीं मिलेगा, आपका इलाज जरूरी है। उसके बाद नारायण ने अपनी बेटी को कॉल किया और पूरी परिस्थिती बताई। उन्होंने बेटी को बताया कि मैं घर ला रहा हूं, वही उचित रहेगा और वह घर लौट आए और तीन दिन में नारायण ने आखिरी सांस ले ली। मानवता की एक अनोखी मिसाल पेश करने वाले नारायण की रगों में राष्ट्र भक्ति थी। जब उनकी परीक्षा हुई तो वो इससे पीछे नहीं हटे आपनी जान की बजाय एक 40 वर्षीय व्यक्ति को एक नई जिंदगी दे गए।

नारायण जैसे कई लोग है जो इस मुश्किल घड़ी में लोगों का साथ दे रहे है। हाल ही में एक मामला सामने आया था, जहां एक कोरोना संक्रमित मरीज को उसके परिजन श्मशान में छोड़ गए। उस वक्त कुछ दूरी पर रह रहे मुस्लिम लोगों ने उनका दाह संस्कार किया वो भी जब, जब उस मृतक को जानते भी नहीं थे। 

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