कोरोना काल में शवों की दुर्गती, जिम्मेदार कौन?

संवाददाता


कोरोना महामारी के आने से समाज का एक नया चेहरा सामने आया है, जो ना चाहते हुए भी हम सबको काफी कुछ सोचने पर मज़बूर कर देता है। देश की आर्थिक स्थिती बिगड़ने के कारण अपने परीजनों की मौत से आहत हुए लोग नहीं चाहते हुए प्रशासन के हाथ की कठपुतली बन कर रहे गए हैं। एक तो बेरोज़गारी की मार और ऊपर से अपने परिज़न को खोने का गम किसी विपदा से कम नही है। तमाम एहतियातों के बावजूद यदि किसी की कोरोना से मौत हो जाती है, तो हस्पताल का खर्च, एंबुलेंस तथा धार्मिक रीति—रिवाज को पूरा करने में सरकारी प्रक्रिया किसी से छिपी नही है। संक्रमण के डर से समाज का साथ भी नही मिल पा रहा है। ऐसे में ना चाहते हुए भी लोगों को अपने परिजनों को हस्पतालों में छोड़ने के अलावा या फिर नदियों में प्रवाहित करने के अलावा और कोई दूसरा विकल्प नहीं रह जाता है। जिस कारण अदालतों में लोकहित याचिका दायर कर मृतकों के अधिकार और गरिमा को बनाए रखने की मांग की जा रही है।

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हमारे देश में मृतकों के लिए कोई भी प्रवधान नहीं है। सुप्रिम कोर्ट ने 1989 में परमानंद कटारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के एक केस में न केवल जीवित व्यक्ति के लिए बल्कि उसके पार्थिक शरीर के लिए भी गरिमा बनाने रखने को कहा है। कोरोना महामारी में एंबुलेंस संचालकों की मनमानी के चलते शवों को श्मशान और कब्रिस्तान तक ले जाने में काफी पैसे वसूले जाते है।  
संक्रमण के फैलने और अपनों के बिछड़ने के दुख के कारण परिजन सब कुछ झेलने को तैयार हैं। बीते दिनों  मृतक के परिजन के साथ हो रही मनमानी की काफी खबर सुनने को मिली है, जिस कारण सर्वोच्च न्यायालय में एक लोकहित याचिका दाखिल की गई है, जिसके तेहत केंद्र सरकार को यह कानून बनाने को कहा गया है। याचिका में कहा गया है कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सलाह दी जाए कि वह इसके विषय में जल्द से जल्द कोई प्रावधान निकाले ताकी मृतक के परिजनों को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े और उनके धर्म अनुसार रीति—रिवाज़ पूरे हो सके।


मई के महीने में गंगा नदी में कोरोना के पीड़ित मरिजों के प्रवाह करने के काफि मामले सामने आए हैं। लोगों से पूछने पर पता चला कि हस्पताल के खर्चे ही इतने हो गये कि अंतिम संस्कार करने के लिऐ ना तो हमारे पास साधन बचे हैं और ना ही पैसै। अब ऐसे में हमारे पास गंगा प्रवाह करने के अलावा और काई विकल्प नही बचा था। बहुत सी जगह एसी भी है, जहॉ  शव को चील, कौए, कुत्तों द्वारा नोचते—खाते देखा गया है। इन सब के कारण जहॉ पहले दाह—संस्कार के लिए राशि दी जाती थी, अब वह भी नि:शुल्क करने की मांग की जा रही है।

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माहामारी के कारण ही सही समाज की एक तस्वीर सामने आई है जिसमें इंसानियत को शर्मिंदा होने पर मज़बूर कर दिया है। मौत के बाद शवों को नदी में फैंक देना या फिर किसी के दाह—संस्कार के नाम पर लावारिस की तरह प्रवाहित कर देना बिल्कुल भी अमानवीय है। किसी भी हाल में इसकी इज़ाज़त नहीं दी जानी चाहिए और अगर कोई ऐसा करता है, तो उसके लिए सख्त से सख्त कार्यवाही की जानी चाहिए ताकि किसी को भी मौत के बाद अपनी दुर्गती होने का डर ना सता सके।

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